भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

पृष्ठ 57, कुल 216 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 57

द्वितीयपटलः। (५३) टीका-योगसाधक यदि संसारसे तरनेकी इच्छा करे तो यावत् वर्णाश्रमका कर्म फलरहित करना उचित है ॥ ५४ ॥ मूलम्-विषयासक्तपुरुषा विषयेषु सुखेप्स- वः ॥ वाचामिरुद्धनिर्वाणा वर्तन्ते पापक- र्मणि ॥ ५५ ॥ टीका-विषयासक्त पुरुष सुख और विषयकी इच्छा में सर्वदा रहते हैं और पापकर्ममें ऐसे तत्पर रहते हैं कि, वाक्यभी उनका परमार्थ विषयमें रुद्ध रहता है अर्थात् मोक्षका साधन तो बहुत दूर है परन्तु परमार्थकी चर्चासेभी उनको ज्वर चढ़ताहै ॥ ५५ ॥ मूलम्-आत्मानमात्मना पश्यन्न किञ्चिदि- ह पश्यति॥ तदा कर्मपरित्यागे न दोषोऽ- स्ति मतं मम ॥ ५६ ॥ टीका-जब ज्ञानी आत्मासे आत्माको देखे और सब वस्तुका अभाव जानपड़े तब कर्मको त्यागदेनेमें कुछ दोष नहीं है यह हमारा मतहै ऐसा श्रीशिवजी जगन्माता पार्वतीजीसे कहते हैं ॥ ५६ ॥ मूलम्-कामादयो विलीयन्ते ज्ञानादेव न चान्यथा ॥ अभावे सर्वतत्त्वानां स्वयं त- त्त्वं प्रकाशते ॥ ५७ ॥: