शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-ज्ञानमें काम क्रोधादि सकल पदार्थ लय होजाते हैं इसमें अन्यथा नहीं है, जब स्वयंतत्त्व' अ- र्थात् आत्मज्ञान प्रकाश होताहै तब सब तत्त्वोंका अभाव होजाताहै ॥ ५७ ॥ इति श्रीशिवसंहितायां हरगौरीसंवादे योगप्रकथने तत्त्वज्ञानोपदेशो नाम द्वितीयः पटलः ॥ २ ॥ अथ तृतीयपटलः । मूलम्-हृद्यस्ति पङ्कजं दिव्यं दिव्यलिङ्गेन भूषितम् ॥ कादिठान्ताक्षरोपेतं द्वादशार्ण विभूषितम् ॥ १ ॥ टीका-प्राणीके हृदयस्थानमें एक पद्म सुन्दर दि- व्यलिङ्गसे शोभायमानहै यह पद्म क-से-ठ-तक द्वादश वर्ण करके शोभित है अर्थात् क-ख-ग-घ-ङ-च-छ-ज- झ-ञ-ट-ठ ॥ १ ॥ मूलम्-प्राणो वसति तत्रैव वासनाभिरलंकृ- तः ॥ अनादिकर्मसंश्लिष्टः प्राप्याहङ्कार- संयुतः ॥ २ ॥ टीका-उसी पद्ममें प्राणकी स्थितिहै और अनादि कर्म अहंकारसंयुक्त वासनासे अलंकृतहै ॥ २ ॥