भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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द्वितीयपटलः । (४१) भी एकही सुषुम्णा मुख्य है इस कारणसे कि, परमपदकी दाताहै योगी लोगोंको हितकारी है अन्य नाडी उसके आश्रय शरीरमें रहती हैं ॥ १६ ॥ मूलम्--नाड्यस्तु ता अधोवदनाःपद्मतन्तु- निभाः स्थिताः ॥ पृष्ठवंशं समाश्रित्य सोमसूर्याग्निरूपिणी ॥ १७ ॥ टीका-यह तीनों नाडी अधोवदनाहैं अर्थात् नीचेको मुख कमलतन्तुके सदृश है और चन्द्र सूर्य अग्निके समान हैं अर्थात् इडा चन्द्ररूप और पिङ्गला सूर्यरूप और सुषुम्णा अग्निरूप है यह तीनों नाडी मेरुदंडके आश्रय स्थित हैं ॥ १७ ॥ मूलम्-तासां मध्ये गता नाडी चित्रा सा मम वल्लभा ॥ ब्रह्मरन्ध्रञ्च तत्रैव सूक्ष्मा- त्सूक्ष्मतरं शुभम् ॥ १८ ॥ टीका-उन तीनों नाडियोंके मध्यमें जो चित्रा नाडी है वह हमको प्रिय है उसी स्थानमें बहुत सूक्ष्म ब्रह्मरंध्र शोभायमान है ॥ १८ ॥ मूलम्-पञ्चवर्णोज्ज्वला शुद्धा सुषुम्णा मध्यचारिणी ॥ देहस्योपाधिरूपा सा सुषुम्णा मध्यरूपिणी ॥ १९ ॥