भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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( २६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । वेदना ॥ निखिलोपाधिहीनो वै यदा भवति पूरुषः ॥ ७३ ॥ टीका-इस जगत्की स्थिति कर्मसे है अर्थात् सुख दुःख जन्म मरण आदि क्लेशोंका कारण कर्मही है अकर्म होजानेसे फिर कुछ दुःख नहीं है यावत् मायाके उपाधिको जब पुरुष जीतके उससे रहित होजाताहै ॥ ७३ ॥ मूलम्-तदा विजयतेऽखंडज्ञानरूपी निरं- जनः॥ स हि कामयते पुरुषः सृजते च प्रजाः स्वयम् ॥ ७४ ॥ टीका--तब अखंडज्ञानरूपी निरंजनका भान हो- ताहै ॥ आत्मा अपने इच्छासे जगत् सृजता अर्थात् उत्पन्न करता है ॥ ७४ ॥ मूलम्-अविद्या भासते यस्मात्तस्मान्मि- थ्या स्वभावतः॥ शुद्धे ब्रह्मणि संबद्धो विद्यया सहजो भवेत् ॥ ७५ ॥ टीका-यह इच्छा अविद्याका कार्य है अविद्या नाम मिथ्याका है तो जब इच्छाही मिथ्या मायासे उत्पन्न है तो उस इच्छाका कार्य कब सत्य होसक्ताहै तात्पर्य यह है कि, मायाके उपाधिसे आत्माका यह इच्छाभूत