भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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(१४) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-जलसे भरा असंख्य शराव अर्थात् मृत्तिका आदिके पात्रमें एक सूर्यका अनेक प्रतिबिंब देख- पडता है वास्तवमें भेद नहीं है जो भेद देख- पडता है वह शरावके संख्याका भेद है ॥ ३६ ॥ जिस प्रकारसे शरावके संख्यासे सूर्यमें भेद जान पडता है उसी प्रकार मायाकी उपाधिसे संसार भिन्न भिन्न जान पडता है वस्तुतः केवल एक ब्रह्म है ॥३६॥ मूलम्-यथैकः कल्पकः स्वप्ने नानावि- धतयेष्यते ॥ जागरोपि तथाप्येकस्तथैव बहुधा जगत् ॥ ३७ ॥ टीका-जैसे स्वप्न अवस्थामें एकसे अनेक कल्पना होतीहै निद्राच्युत होजानेपर कुछ नहीं रहता उसी प्रकार मायाके आवरणसे अनेक संसार जान पडता है जब ज्ञानरूपी खङ्गसे मायाका पटल कटजाता है तब शिवाय शुद्धब्रह्मके और कुछ नहीं रहजाता ॥ ३७ ॥ मूलम्-सर्पबुद्धिर्यथा रज्जौशुक्तौवा रजतभ्र- मः ॥३८॥ तद्वदेवमिदं विश्वं विवृतं पर- मात्मनि ॥ रज्जुज्ञानाद्यथा सर्पो मिथ्या रूपो निवर्तते ॥ ३९ ॥ आत्मज्ञानात्तथा याति मिथ्याभूतमिदं जगत् ॥ रौप्यभ्रा- न्तिरियं याति शुक्तिज्ञानाद्यथा खलु ४०