भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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प्रथमपटलः । ( १३ ) है सो आत्माही है सो श्रुति मुक्तिकी देनेवाली है यत्न करके सेवनके योग्य है ॥ ३२ ॥ मूलम्-दुरितेषु च पुण्येषु यो धीवृत्तिं प्रचा- दयात् ॥ सोऽहं प्रवर्तते मत्तो जगत्सर्वं चराचरम् ॥ ३३ ॥ सर्वं च दृश्यते मत्तः सर्वं च मयि लीयते ॥ न तद्भिन्नोऽ- हमस्मीह मद्भिन्नो न तु किंचन ॥ ३४ ॥ टीका-पाप पुण्य दोनोंमें समानरूपकी बुद्धिको जो वृत्ति प्रेरणा करती है सो हम हैं और हमसेही सब जगत् चराचर उत्पन्न है ॥ ३३ ॥ और जो देख पड़ताहै वह सब हम हैं हममेंही सब लीन होताहै न वह हमसे भिन्न है न हम उससे किंचित्मात्र भिन्न हैं ता- त्पर्य यह है कि, वह आत्मा जिससे यह जगत् उत्पन्नहै हमसे भिन्न नहीं है इस हेतुसे इस संसारके स्थिति संहार कर्त्ता हम हैं ऐसी वृत्ति योगीकी रहती है ॥३४॥ मूलम्--जलपूर्णेष्वसंख्येषु शरावेषु यथा- भवेत् ॥ एकस्य भात्यसंख्यत्वं तद्भेदोऽत्र न दृश्यते ॥ ३५ ॥ उपाधिषु शरावेषु या संख्या वर्तते परा ॥ सा संख्या भवति यथा रवौ चात्मनि तत्तथा ॥ ३६ ॥