भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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( १२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । कर्म कहाहै इसी पुण्य पापसे शरीर बंधायमान है अर्थात् बारंबार शरीरधारण करनेका कारण है ॥ २९ ॥ मूलम्-इहामुत्र फलद्वेषी सफलं कर्म सं- त्यजेत् ॥ नित्यनैमित्तिके संगं त्यक्त्वा योगे प्रवर्त्तते ॥ ३० ॥ टीका-इस लोकका भोग वा परलोकके फलकी इच्छा और नित्य नैमित्तिक आदि कर्मोंको फलसहित त्यागके योगाभ्यास अर्थात् परब्रह्मके विचारमें महात्मा जनोंके तत्पर रहना उचित है ॥ ३० ॥ मूलं-कर्मकाण्डस्य माहात्म्यं ज्ञात्वा यो- गी त्यजेत्सुधीः ॥ पुण्यपापद्वयं त्यक्त्वा ज्ञानकाण्डे प्रवर्त्तते ॥ ३१ ॥ टीका- कर्मकाण्डके माहात्म्यको जानके योगीको उचितहै कि, पुण्य पाप दोनोंको तृणवत् विचारके त्याग दे और ज्ञानकाण्डमें तत्पर होरहै ॥ ३१ ॥ मूलम्--आत्मा वारे च श्रोतव्यो मंतव्य इति यच्छ्रुतिः ॥ सा सेव्या तत्प्रयत्नेन मुक्तिदा हेतुदायिनी ॥ ३२.॥ टीका- यह श्रुतिका वाक्य है कि, आत्माको सुनो और आत्माको मनन करो अर्थात् जो कुछ