शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमपटलः । ( ११ ) मूलम्-पापभोगावसाने तु पुनर्जन्म भवे- त्खलु ॥ पुण्यभोगावसाने तु नान्यथा भवति ध्रुवम् ॥ २७ ॥ टीका-पापका फल भोगनेके पीछे अवश्य फिर जन्म होताहै ऐसेही पुण्यफल भोगनेके अंतमें निश्चय फिर जन्म होता है अन्यथा नहीं होता ॥ २७ ॥ मूलम्-स्वर्गेऽपि दुःखसंभोगः परस्त्रीदर्शना- द्ध्रुवम् ॥ ततो दुःखमिदं सर्वं भवेन्नास्त्यत्र संशयः ॥ २८ ॥ टीका-स्वर्गमेंभी दुःखहैं इस कारणसे कि, उस स्था- नमें परस्त्रीका दर्शन अवश्य होताहै उसकी अप्राप्तिमें मानसिक व्यथा उत्पन्न होती है अन्य भी राग द्वेषादि बहुतसे कारण हैं कि, प्राणीके चित्तको स्वर्गमें भी स्थिर नहीं रहने देते इस हेतुसे संसारमें सिवाय दुःखके सुख नहीं है ॥ २८ ॥ मूलम्-तत्कर्मकल्पकैः प्रोक्तं पुण्यंपापमि- ति द्विधा ॥ पुण्यपापमयो बन्धो देहिनां भवति क्रमात् ॥ २९ ॥ टीका-बुद्धिमान् लोगोंने पुण्य और पाप दोप्रकारक