भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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( १० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । है तात्पर्य यह है कि, जैसा जो मनुष्य शुभाशुभ कर्म करता है वैसेही नरक वा स्वर्गमें जाताहै ॥ २३ ॥ मूलम्-पुण्यकर्माणि वै स्वर्गो नरकः पापक- र्मणि ॥ कर्मबंधमयी सृष्टिर्नान्यथा भव- ति ध्रुवम् ॥ २४ ॥ टीका-पुण्यकर्म करनेसे स्वर्गमें जाताहै और पापक- र्मसे नरकमें जाताहै. संसार कर्मसे निश्चय करके बंधाहै दूसरा हेतु नहीं है तात्पर्य यह है कि, जो ईश्वरको जानके कर्माकर्मसे अपनेको रहित समझेगा वह इस बंधसे छूटजायगा ॥ २४ ॥ मूलम्-जन्तुभिश्चानुभूयंते स्वर्गे नानासुखा- नि च ॥ नानाविधानि दुःखानि नरके दुः- सहानि वै ॥ २५ ॥ टीका-प्राणी स्वर्गमें नानाप्रकारके सुखका अनुभव करता है ऐसेही बहुत प्रकारके दुःसह दुःख नरकमें भी भोगता है ॥ २५ ॥ मूलम्-पापकर्मवशाद्दुःखंपुण्यकर्मवशात्सुखं तस्मात्सुखार्थी विविधं पुण्यं प्रकरुते ध्रुवं २६ टीका-पापकर्म करनेसे दुःख होता है और पुण्यकर्म करनेसे सुख होताहै इस हेतुसे निश्चय करके सुखार्थी पुरुष नानाप्रकारके पुण्य करते हैं ॥ २६ ॥