शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदेश करतेहैं विवादशील लोगोंका मत दुर्ज्ञानका हेतु है यह त्यागनेके योग्य है ॥ २ ॥ ॥ ३ ॥ मूलम्-सत्यं केचित्प्रशंसन्ति तपः शौचं तथापरे ॥ क्षमां केचित्प्रशंसन्ति तथैव श- ममार्ज्जवम्॥४॥ केचिद्दानं प्रशंसन्ति पि- तृकर्म तथापरे ॥ केचित्कर्म प्रशंसन्ति केचिद्वैराग्यमुत्तमम् ॥ ५॥ टीका-कोई सत्यकी प्रशंसा करते हैं, कोई तपस्या- की, कोई शौचाचारकी, कोई क्षमाकी प्रशंसा, कोई स- मताकी, कोई सरलताकी, कोई दानकी प्रशंसा, कोई पितृकर्मकी, कोई सकाम उपासनाकी, कोई पुरुष वैराग्यको उत्तम कहतेहैं ॥ ४ ॥ ५ ॥ मूलम्-केचिद्गृहस्थकर्माणि प्रशंसन्ति विच- क्षणाः ॥ अग्निहोत्रादिकं कर्म तथा केचि- त्परं विदुः ॥ ६ ॥ मन्त्रयोगं प्रशंसन्ति केचित्तीर्थानुसेवनम् ॥ एवं बहूनुपायां- स्तु प्रवदन्ति विमुक्तये ॥ ७ ॥ टीका-कोई पुरुष गृहस्थकर्मकी प्रशंसा करते हैं, कोई बुद्धिमान् पुरुष अग्निहोत्रादिक कर्मकी प्रशंसा करतेहैं कोई मंत्रादिक कोई तीर्थसेवन करना मुख्य