भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 216 में से

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(१००) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । गोंका नाश करदेगा और शरीरमें सुन्दर कान्ति होगी और वृद्धावस्थासहित मृत्युका नाश होजायगा और सुखसहित वाञ्छित फल लाभ होगा और इन्द्रियोंका निग्रह रहेगा यह सब जो कहा है सो योगारूढ यो- गीको अभ्याससे वश होजाताहै इसमें संशय नहीं है निश्चय है ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ मूलम्-गोपनीया प्रयत्नेन मुद्रेयं सुरपूजि- ते ॥ यां तु प्राप्य भवाम्भोधेः पारं गच्छ- न्ति योगिनः ॥ ३५ ॥ टीका-हेसुरपूजिते देवी ! यह मुद्रा यत्न करके गो- पनीय है योगीलोग इसको लाभ करके संसाररूपी स- मुद्रके पार होजाते हैं ॥ ३५ ॥ मूलम्-मुद्रा कामदुघा ह्येषा साधकानां म- योदिता ॥ गुप्ताचारेण कर्त्तव्या न देया यस्य कस्यचित् ॥ ३६ ॥ टीका-हेदेवी ! यह मुद्रा जो हमने कही है साधकोंको कामधेनुरूप है अर्थात् वाञ्छितफलकी दाता है इसको गुप्त करके अभ्यास करना उचित है और सबको अर्थात् अनधिकारीको देना उचित नहीं है ॥ ३६ ॥ अथ महाबन्धकथनम् । मूलम्-ततः प्रसारितः पादो विन्यस्य तमूरु-

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