शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थपटलः । ( १०९ ) टीका-इस जालन्धरबन्धके प्रभावसे बुद्धिमान् योगी स्वयं अमृत पान करताहै और अमरत्वको पाय- के तीनोंलोकमें आनन्दपूर्वक विचरता है ॥ ६२ ॥ मूलम्-जालन्धरो बन्ध एष सिद्धानां सि- द्धिदायकः॥ अभ्यासः क्रियते नित्यं यो- गिना सिद्धिमिच्छता ॥ ६३ ॥ टीका-यह जालन्धरबन्ध सिद्धोंको सिद्धिदेनेवाला है इस कारणसे सिद्धिकांक्षी योगीको इसका नित्य अ- भ्यास करना उचित है ॥ ॥ ६३ ॥ अथ मूलबन्धः । मूलम्-पादमूलेन संपीड्य गुदमार्गेषु य- न्त्रितम् ॥६४॥ बलादपानमाकृष्य क्रमा- दूर्ध्वं सुचारयेत् ॥ कल्पितोऽयं मूलबन्धो जरामरणनाशनः ॥ ६५ ॥ टीका-पादमूल अर्थात् एडीसे गुदामार्गको आकु- ञ्चन करके पीडितकरे और बलसे अपानवायुको आक- र्षण करके ऊर्ध्वको लेजाय अर्थात् प्राणके साथ सम्बन्धकरे इसको मूलबन्ध कहतेहैं यहबन्ध जरा मरणका नाश करनेवाला ह ॥ ६४ ॥ ६५ ॥ मूलम्-अपानप्राणयोरैक्यं प्रकरोत्यधि-