भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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( ११० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । कल्पितम् ॥ बन्धेनानेन सुतरां योनिमुद्रा प्रसिद्ध्यति ॥ ६६ ॥ टीका-इस कल्पितबन्धसे अपान और प्राणको एक करे और इसी मूलबन्धके प्रभावसे योनिमुद्रा आपही सिद्ध होजायगी ॥ ६६ ॥ मूलम्-सिद्धायां योनिमुद्रायां किं न सिध्य- ति भूतले ॥ बन्धस्यास्य प्रसादेन गगने विजितानिलः ॥ पद्मासने स्थितो योगी भुवमुत्सृज्य वर्तते ॥ ६७ ॥ टीका-योनिमुद्राके सिद्ध होनेसे सिद्धलोगोंको इस संसारमें सब सिद्ध होसक्ताहै इस मूलबन्धके प्रसा- दसे वायुको योगी जीतके पद्मासनस्थित होके भूमिको त्याग देगा और आकाशमें गमन करेगा ॥ ६७ ॥ मूलम्-सुगुप्ते निर्जने देशे बन्धमेनं सम- भ्यसेत् ॥ संसारसागरं तर्तुं यदिच्छेद्व्यो- गिपुंगवः ॥ ६८ ॥ टीका-पवित्र योगी यदि संसारसागरसे पार होने- की इच्छा करे तो निर्जनदेश और गुप्तस्थानमें इस मूलबन्धका अभ्यास करना उचित है ॥ ६८ ॥ अथ विपरीतकरणी मुद्रा । मूलम्-भूतले स्वशिरोदत्त्वा खे नयेच्चरणद्व-