शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थपटलः । ( १११ ) यम् ॥ विपरीतकृतिश्चैषा सर्वतन्त्रेषु गो- पिता ॥ ६९ ॥ टीका-साधक अपने शिरको भूमिपर धरे और दोनों चरणोंको ऊपर आकाशमें निरालम्ब स्थिर करे यह विपरीतकरणी मुद्रा सर्वतन्त्रोंकरके गोपित है अर्थात् प्रकाश करने योग्य नहीं है ॥ ६९ ॥ मूलम्-एतद्यः कुरुते नित्यमभ्यासं याम- मात्रतः ॥ मृत्युं जयति योगीशः प्रलये नापि सीदति ॥ ७० ॥ टीका-इसप्रकारसे इस मुद्राका अभ्यास नित्य एक प्रहर करे तो योगी निश्चय मृत्युको जीतलेगा और प्रलयमेंभी उसको कुछ कष्ट न होगा ॥ ७० ॥ मूलम्-कुरुतेऽमृतपानं यः सिद्धानां सम- तामियात् ॥ स सेव्यः सर्वलोकानां बन्ध- मेनं करोति यः ॥ ७१ ॥ टीका-जो पुरुष शरीरस्थअमृतपान करता है उस- को सिद्धोंकी समता प्राप्त होती है और इस मुद्राबन्ध- को जो करताहै वह सर्वलोकमें पूजनीय है ॥ ७१ ॥ मूलम्-नाभेरूर्ध्वमधश्चापि तानं पश्चिम- माचरेत् ॥ उड्ड्यानबंध एष स्यात्सर्वदुः-