शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
चतुर्थपटलः । ( १११ ) यम् ॥ विपरीतकृतिश्चैषा सर्वतन्त्रेषु गो- पिता ॥ ६९ ॥ टीका-साधक अपने शिरको भूमिपर धरे और दोनों चरणोंको ऊपर आकाशमें निरालम्ब स्थिर करे यह विपरीतकरणी मुद्रा सर्वतन्त्रोंकरके गोपित है अर्थात् प्रकाश करने योग्य नहीं है ॥ ६९ ॥ मूलम्-एतद्यः कुरुते नित्यमभ्यासं याम- मात्रतः ॥ मृत्युं जयति योगीशः प्रलये नापि सीदति ॥ ७० ॥ टीका-इसप्रकारसे इस मुद्राका अभ्यास नित्य एक प्रहर करे तो योगी निश्चय मृत्युको जीतलेगा और प्रलयमेंभी उसको कुछ कष्ट न होगा ॥ ७० ॥ मूलम्-कुरुतेऽमृतपानं यः सिद्धानां सम- तामियात् ॥ स सेव्यः सर्वलोकानां बन्ध- मेनं करोति यः ॥ ७१ ॥ टीका-जो पुरुष शरीरस्थअमृतपान करता है उस- को सिद्धोंकी समता प्राप्त होती है और इस मुद्राबन्ध- को जो करताहै वह सर्वलोकमें पूजनीय है ॥ ७१ ॥ मूलम्-नाभेरूर्ध्वमधश्चापि तानं पश्चिम- माचरेत् ॥ उड्ड्यानबंध एष स्यात्सर्वदुः-
( ११२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । खौघनाशनः ॥ ७२ ॥ उदरे पश्चिमं तानं नाभेरूर्ध्वं तु कारयेत् ॥ उड्ड्यानाख्यो- ऽत्र बन्धोयं मृत्युमातङ्गकेसरी ॥ ७३ ॥ टीका—नाभिसे ऊपर और नीचेको आकुञ्चन करे इसको उड्ड्यानबन्ध कहते हैं यह दुःखके समूहको नाशकरनेवाला है उदरको पीछे आकर्षण करे और नाभिसे ऊपर भागमें आकुञ्चन करे यह उड्ड्यानबन्ध है और मृत्युरूपी मातङ्गका नाशकरनेवाला यह बंध- रूपी सिंह है ॥ ७२ ॥ ७३ ॥ मूलम्-नित्यं यः कुरुते योगी चतुर्वारं दिने दिने॥ तस्य नाभेस्तु शुद्धिः स्याद्येन सिद्धो भवेन्मरुत् ॥ ७४ ॥ टीका-जो योगी नित्य इस बंधको चारवार अ- भ्यास करेगा उसका नाभिचक्र शुद्ध होके वायु सिद्ध होजायगा ॥ ७४ ॥ मूलम्-षण्मासमभ्यसन्योगी मृत्युं जयति निश्चितम् ॥ तस्योदराग्निर्ज्वलति रसवृ- द्धिः प्रजायते ॥ ७५ ॥ टीका-योगी यदि छः मास इस बंधका अभ्यास करे तो निश्चय मृत्युको जीतलेगा और उसका जठरा-
चतुर्थपटलः । ( ११३ ) नल विशेष प्रज्वलित होगा और रसकी वृद्धि उत्पन्न होगी ॥ ७५ ॥ मूलम्-अनेन सुतरां सिद्धिर्विग्रहस्य प्रजा- यते ॥ रोगाणां संक्षयश्चापि योगिनो भव- ति ध्रुवम् ॥ ७६ ॥ टीका-इस उड्डयानबंधके प्रभावसे योगीका शरीर आपही सिद्ध हो जायगा अर्थात् अमर होजायगा और सर्व रोगोंका निश्चय क्षय होजायगा ॥ ७६ ॥ मूलम्-गुरोर्लब्ध्वा प्रयत्नेन साधयेत्तु विच- क्षणः ॥ निर्जने सुस्थिते देशे बन्धं परम- दुर्लभम् ॥ ७७ ॥ टीका-गुरुसे यत्नपूर्वक इस परमदुर्लभ बन्धको लाभ करके बुद्धिमान् साधक एकांतस्थानमें स्वस्थ- चित्त होके साधन करे ॥ ७७ ॥ अथ वज्रोलीमुद्रा । मूलम्-वज्रोलीं कथयिष्यामि संसारध्वा- न्तनाशिनीम् ॥ स्वभक्तेभ्यः समासेन गुह्याद्गुह्यतमामपि ॥ ७८ ॥ टीका-हे देवी ! संसारतमनाशिनी परमगोपनीय वज्रोली मुद्रा भक्तलोगोंके प्रति हम कहते हैं ॥ ७८ ॥
( ११४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। मूलम्-स्वेच्छया वर्तमानोपि योगोक्तनिय- मैर्विना॥ मुक्तो भवति गार्हस्थ्यो वज्रोल्य- भ्यासयोगतः ॥ ७९ ॥ टीका-गृहस्थ अपनी इच्छापूर्वक गृहमें भोग करे- गा और योगमें जो नियम कहा है उसके विना इस व- ज्रोलीमुद्राके योग अभ्याससे मुक्त होजायगा ॥ ७९ ॥ मूलम्-वज्रोल्यभ्यासयोगोऽयं भोगयुक्ते- ऽपि मुक्तिदः ॥ तस्मादतिप्रयत्नेन कर्त- व्यो योगिभिः सदा ॥ ८० ॥ टीका-यह वज्रोलीका योगअभ्यास भोगयुक्त म- नुष्योंके प्रति मुक्तिका दाता है इसकारणसे अतियत्न करके सर्वदा योगीको अभ्यास करना उचित है ॥ ८० ॥ मूलम्-आदौ रजः स्त्रियो योन्या यत्नेन वि- धिवत्सुधीः ॥ आकुंच्य लिंगनालेन स्व- शरीरे प्रवेशयेत् ॥ ८१ ॥ स्वकं बिंदुञ्च सं- र्बन्ध्य लिंगचालनमाचरेत् ॥ दैवाच्चल- ति चेदूर्ध्वं निबद्धो योनिमुद्रया ॥ ८२ ॥ वाममार्गेऽपि तद्विन्दुं नीत्वा लिङ्गं निवार- येत् ॥ क्षणमात्रं योनितो यः पुमांश्चालन-
चतुर्थपटलः । (११५) माचरेत् ॥ ८३ ॥ गुरूपदेशतो योगी हुंहु- ङ्कारेण योनितः ॥ अपानवायुमाकुंच्य बलादाकृष्य तद्रजः ॥ ८४ ॥ टीका-प्रथम बुद्धिमान् साधक यत्न करके विधान पूर्वक स्त्रीके योनिसे रजको लिङ्गनालमें आकर्षण क- रके अपने शरीरमें प्रवेश करे और अपने बिन्दुको नि- रोध करके लिङ्ग चालनकरे यदि दैवात् बिन्दु अपने स्थानसे चले तो योनिमुद्रासे निरोध करके ऊपरको आकर्षण करे और उस बिन्दुको वामभागमें स्थित क- रके क्षणमात्र लिङ्गचालन निवारण करे फिर गुरूपदे- शद्वारा योगी हुंहुंकार शब्द उच्चारणपूर्वक योनिमें लिङ्ग चालन करे और बलसे अपानवायुको आकुञ्चन करके स्त्रीके रजको आकर्षण करे इसको वज्रोली मुद्रा कहते हैं ॥ ८१ ॥ ८२ ॥ ८३ ॥ ८४ ॥ मूलम्-अनेन विधिना योगी क्षिप्रं योगस्य सिद्धये ॥ गव्यभुक्कुरुते योगी गुरुपा- दाब्जपूर्वकः ॥ ८५ ॥ टीका-इस विधानसे योगीको शीघ्र योग सिद्ध हो- गा और गुरुपादपद्मपूजक योगी शरीरस्थ अमृतपान करेगा ॥ ८५ ॥
( ११६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-बिन्दुंविधुमयो ज्ञेयो रजः सूर्यमय- स्तथा ॥ उभयोर्मेलनं कार्यं स्वशरीरे प्र- वेशयेत् ॥ ८६ ॥ टीका-बिन्दुरूपी चन्द्र और रजरूपी सूर्य यह जानकर दोनोंका सम्बन्ध करके अपने शरीरमें प्रवेश करना उचित है ॥ ८६ ॥ मूलम्-अहं बिन्दू रजः शक्तिरुभयोर्मेलनं यदा ॥ योगिनां साधनावस्था भवेद्दिव्यं वपुस्तदा ॥ ८७ ॥ टीका-यदि शिवरूपी बिन्दु और रजरूपी शक्ति यह दोनोंका सम्बन्ध होगा तब योगीका साधनसे दिव्य शरीर अर्थात् देवतोंके समान शरीर होगा तात्पर्य यह है कि शिवशक्ति अर्थात् माया ईश्वरके सम्बन्ध वा मायाको ईश्वरमें लय करनेसे जिसको अध्यारोप अप- वाद कहते हैं योगी मोक्ष होता है अभिप्राय यह है कि, रजविन्दुका सम्बन्ध जिस साधकको सिद्ध होजाताहै वह मुक्त है ॥ ८७ ॥ मूलम्-मरणं बिन्दुपातेन जीवनं बिन्दुधा- रणे ॥ तस्मादतिप्रयत्नेन कुरुते बिन्दुधा- रणम् ॥ ८८ ॥
चतुर्थपटलः । ( ११७ )
टीका-बिन्दुपात होनेसे मृत्यु होती है और बिन्दु- के धारणसे प्राणी जीवताहै इस कारणसे यत्नसे बिन्दु- को धारण रखना उचित है ॥ ८८ ॥
मूलम्-जायते म्रियते लोके बिन्दुना नात्र संशयः ॥ एतज्ज्ञात्वा सदा योगी बिन्दु- धारणमाचरेत् ॥ ८९ ॥
टीका-प्राणीका जन्म मरण बिन्दुसे होताहै इसमें संशय नहीं है. इस हेतुसे इसको विचारके योगीको उ- चित है कि, विन्दुको सर्वदा धारण रक्खे ॥ ८९ ॥
मूलम्-सिद्धे बिन्दौ महायत्ने किं न सिध्य- ति भूतले ॥ यस्य प्रसादान्महिमा ममा- प्येतादृशो भवेत् ॥ ९० ॥
टीका--हे पार्वती ! यत्नपूर्वक बिन्दुके सिद्ध होनेसे संसारमें क्या नहीं सिद्ध होसक्ता अर्थात् सब सिद्ध हो सक्ताहै इसीके प्रसादसे हमारी ऐसी महिमा है ॥ ९० ॥
मूलम्-बिन्दुः करोति सर्वेषां सुखं दुःखञ्च संस्थितः ॥ संसारिणां विमूढानां जरामर- णशालिनाम् ॥ ९१ ॥ अयंच शांकरो योगो योगिनामुत्तमोत्तमः ॥ ९२ ॥
टीका-बिन्दु संसारी मनुष्योंके सुख और दुःखका
( ११८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । कारण है और मूढलोगोंके मूढताका और जरामरण शील लोगोंका अर्थात् सबका यही विन्दु हेतु है योगी लोगोंके प्रति यह हमारा उत्तम योग है ॥ ९१ ॥ ९२ ॥ मूलम्-अभ्यासात्सिद्धिमाप्नोति भोगयु- क्तोऽपि मानवः ॥ सकलः साधितार्थोपि सिद्धो भवति भूतले ॥ ९३ ॥ टीका-भोगयुक्त मनुष्योंकोभी अभ्याससे सिद्धि प्राप्त होतीहै और सकल वाञ्छितफल संसारमें सिद्ध होजाते हैं ॥ ९३ ॥ मूलम्-भुक्त्वा भोगानशेषान् वै योगेनानेन निश्चितम् ॥ अनेन सकला सिद्धिर्योगिनां भवति ध्रुवम् ॥ सुखभोगेन महता तस्मा- देनं समभ्यसेत् ॥ ९४ ॥ टीका-इस योगअभ्यासद्वारा निश्चय अशेषभोग भोगनेसे सुखी होगा और योगीलोगोंको इस वज्रो- लीमुद्रासे सकल सिद्धी अवश्य प्राप्तहोती हैं और महानसुख भोगते हुए यह साधना सिद्ध होगी इसलि- ये इसका अभ्यास करना उचित है ॥ ९४ ॥ मूलम्-सहजोल्यमरोली च वज्रोल्या भेद- तो भवेत् ॥ येन केन प्रकारेण बिन्दुं योगी प्रधारयेत् ॥ ९५ ॥
चतुर्थपटलः । ( ११९ ) टीका-वज्रोलीके भेदसे सहजोली और अमरोली मुद्राकी संज्ञा है योगीको उचित है कि सबप्रकारसे बिन्दुको धारण करे ॥ ९५ ॥ मूलम्-दैवाच्चलति चेदङ्गे मेलनं चन्द्रसूर्य- योः॥ अमरोलिरियं प्रोक्ता लिंगनालेन शोषयेत् ॥ ९६ ॥ टीका-यदि हठात् वेगवश बिन्दु चले और रजविन्दु- का सम्बन्ध होजाय तो इसको अमरोली कहते हैं परंतु लिङ्गनालद्वारा रजविन्दु दोनोंको शोषण करे ॥ ९६ ॥ मूलम्-गतं बिन्दुं स्वकं योगी बन्धयेद्योनिमु- द्रया ॥ सहजोलिरियं प्रोक्ता सर्वतन्त्रेषु गोपिता ॥ ९७ ॥ टीका-निजविन्दु चलायमान होय तो योगी योनि- मुद्राके बन्धसे अवरोध करे इसको सहजोली कहते हैं यह सर्वतन्त्रों करके गोपनीय है ॥ ९७ ॥ मूलम्-संज्ञाभेदाद्भवेद्भेदः कार्यं तुल्यग- तिर्यदि ॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन साध्यते योगिभिः सदा ॥ ९८ ॥ . टीका-यदि कार्य एक समान है परन्तु संज्ञासे अमरोली और सहजोली दो भेद भया है इस हेतुसे
( १२० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । योगीको उचित है कि, यह दोनों अमरोली और सहजो- लीका यत्नपूर्वक सर्वदा साधन करे ॥ ९८ ॥ मूलम्-अयं योगो मया प्रोक्तो भक्तानां स्नेहतः प्रिये ॥ गोपनीयः प्रयत्नेन न देयो यस्य कस्यचित् ॥ ९९ ॥ टीका-हेप्रिये पार्वती ! हम भक्तोंपर प्रेम करके यह योग जो कहा है यत्नपूर्वक गोपनीय है सामान्य मनुष्य- को कदापि देना उचित नहीं है ॥ ९९ ॥ मूलम्--एतद्गुह्यतमं गुह्यं न भूतं न भविष्य ति ॥ तस्मादेतत्प्रयत्नेन गोपनीयं सदा बुधैः ॥ १०० ॥ टीका-इस वज्रोलीमुद्रासे अधिक गोपनीय न कुछ भया है न होगा. इसकारणसे बुद्धिमान साधकको यत्नपूर्वक इसको गोप्य रखना उचित है ॥ १०० ॥ मूलम्-स्वमूत्रोत्सर्गकाले यो बलादाकृ- ष्य वायुना ॥ स्तोकं स्तोकं त्यजेन्मूत्रमू- र्ध्वमाकृष्य तत्पुनः ॥१०१॥ गुरूपदिष्टमा- र्गेण प्रत्यहं यः समाचरेत् ॥ बिन्दुसिद्धि- र्भवेत्तस्य महासिद्धिप्रदायिका ॥ १०२ ॥
चतुर्थपटलः । (१२१) टीका-गुरूके उपदेशपूर्वक सर्वदा मूत्रत्यागनेके समय बलकरके वायुसे आकर्षणपूर्वक थोडा थोडा मूत्र त्यागकरे फिर ऊपरको आकर्षण करे तो उसका विन्दु सिद्ध होजायगा यह विन्दु की सिद्धी महासिद्धीकी दाता है अर्थात् परमपदको प्राप्त करती है ॥ १०१॥१०२॥ मूलम्-षण्मासमभ्यसेद्यो वै प्रत्यहं गुरु- शिक्षया ॥ शतांगनेपि भोगेपि तस्य बि- न्दुर्न नश्यति ॥ १०३ ॥ टीका-गुरूके शिक्षापूर्वक योगी यदि छः मास नि- त्य इसका अभ्यासकरे तो शत स्त्रीसे भोगकरेगा तो भी उसका विन्दुपात नहोगा ॥ १०३ ॥ मूलम्-सिद्धे बिन्दौ महायत्ने किं न सिद्ध्य- ति पार्वति ॥ ईशत्वं यत्प्रसादेन ममापि दुर्लभं भवेत् ॥ १०४ ॥ टीका-हेपार्वती ! जब महायत्नसे विन्दु सिद्ध होजा- यगा तब क्या नहीं सिद्धहोगा अर्थात् सब सिद्ध हो- जायगा इसके प्रसादसे यह दुर्लभ ईशत्व हमको प्राप्त भयाहै ॥ १०४ ॥ अथ शक्तिचालनमुद्रा । मूलम्-आधारकमले सुप्तां चालयेत्कुण्ड-
( १२२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । लीं दृढाम्॥ अपानवायुमारुह्य बलादाकृ- ष्य बुद्धिमान् ॥ १०५ ॥ शक्तिचालनमु- द्रेयं सर्वशक्तिप्रदायिनी ॥ १०६ ॥ टीका-आधारकमलमें घोर निद्रित कुण्डलिनीको बुद्धिमान् अपानवायुपर आरूढहोके आकर्षणपूर्वक हठात् चलावे अर्थात् भ्रमावे यह शक्तिचालनमुद्रा सर्वशक्तिकी दाता है ॥ १०५ ॥ १०६ ॥ मूलम्-शक्तिचालनमेवं हि प्रत्यहं यः स- माचरेत् ॥ आयुर्वृद्धिर्भवेत्तस्य रोगाणां च विनाशनम् ॥ १०७ ॥ टीका-यह शक्तिचालनमुद्रा जो प्रतिदिन करे तो उसके आयुकी वृद्धी होगी और सर्वरोगोंका इस मुद्राके प्रभावसे नाश होजायगा ॥ १०७ ॥ मूलम्-विहाय निद्रां भुजगी स्वयमूर्ध्वं भवेत्खलु ॥ तस्मादभ्यासनं कार्यं योगि- ना सिद्धिमिच्छता ॥ १०८ ॥ टीका-इस शक्तिचालनके साधनसे कुण्डलिनी नि- द्राको त्यागके आपही ऊर्ध्वगामी होजायगी यह नि- श्चय है. इस हेतुसे सिद्धिकी इच्छा करनेवाले योगीको उचित है कि, इसका अभ्यास करे ॥ १०८ ॥
चतुर्थपटलः । ( १२३) मूलम्-यः करोति सदाभ्यासं शक्तिचाल- नमुत्तमम् ॥ येन विग्रहसिद्धिः स्यादाणि- मादिगुणप्रदा ॥ गुरूपदेशविधिना तस्य मृत्युभयं कुतः ॥ १०९ ॥ टीका-यदि इस उत्तमशक्तिचालनमुद्राका सदा अभ्यासकरे तो उसका शरीर सिद्ध अर्थात् अमर हो- जायगा और यह मुद्रा अणिमादिक सिद्धिकी दाता है. गुरूके उपदेशपूर्वक विधानसे जो इसका अभ्यास करे तो उसको मृत्युका भय नहीं है ॥ १०९ ॥ मूलम्-मुहूर्तद्वयपर्यन्तं विधिना शक्ति- चालनम् ॥ ११० ॥ यः करोति प्रयत्नेन त- स्य सिद्धिरदूरतः ॥ युक्तासनेन कर्तव्यं योगिभिः शक्तिचालनम् ॥ १११ ॥ टीका-जो विधानपूर्वक यत्नसे यदि दोमुहूर्तपर्यंत शक्तिचालन करे तो उसको सर्वसिद्धिकी प्राप्ति होगी. योगीको उचित है कि, गुरुके उपदेशानुसार योगासनसे युक्त होके शक्तिचालनका अभ्यास करे ॥११०॥१११॥ मूलम्-एतत्सुमुद्रादशकं न भूतं न भविष्य- ति ॥ एकैकाभ्यासने सिद्धिः सिद्धो भव- ति नान्यथा ॥ ११२ ॥
( १२४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-हे पार्वती! यह दशमुद्रा जो हमने कहा है इसके समान न कुछ भया है न होगा इसके एक एकके अ- भ्यास सिद्ध होनेसे साधक सिद्ध होजायगा ॥ ११२ ॥ इति श्रीशिवसंहितायां हरगौरीसंवादे मुद्राकथनं नाम चतुर्थपटलः समाप्तः ॥ ४ ॥ अथ पञ्चमः पटलः । मूलम्-श्रीदेव्युवाच ॥ ब्रूहि मे वाक्यमी- शान परमार्थधियं प्रति॥ ये विघ्नाः सन्ति लोकानां वद मे प्रिय शङ्कर ॥ १ ॥ टीका-श्रीपार्वतीजी कहती है कि, हेईश्वर ! हे प्रिय शङ्कर ! योगाभ्यासी लोगोंके प्रति जो विघ्न संसारमें हैं सो भक्तोंपर कृपा करके हमको कहो ॥ १ ॥ मूलम्-ईश्वर उवाच ॥ शृणु देवि प्रवक्ष्या- मि यथा विघ्नाः स्थिताः सदा ॥ मुक्तिं प्र- ति नराणाञ्च भोगः परमबन्धनः ॥ २ ॥ टीका-श्रीईश्वर कहते हैं कि, हे देवी ! योगसाधनमें जो विघ्न हैं सो हम कहते हैं सुनो मनुष्योंके मुक्तिके प्रति भोग परमबन्धन है ॥ २ ॥ अथ भोगरूपयोगविघ्नविद्याकथनम् ॥ मूलम्-नारी शय्याऽसनं वस्त्रं धनमस्य विड-
पंचमपटलः। ( १२५) म्बनम्॥ ताम्बूलभक्ष्यानानि राज्यैश्वर्य- विभूतयः ॥३॥ हेमं रौप्यं तथा ताम्रं रत्न- श्चागुरुधेनवः॥पाण्डित्यं वेदशास्त्राणि नृ- त्यं गीतं विभूषणम् ॥४॥ वंशी वीणा मृद- ङ्गाश्च गजेंद्रश्चाश्ववाहनम् ॥ दारापत्यानि विषया विघ्ना एते प्रकीर्तिताः॥ भोगरूपा इमे विघ्ना धर्मरूपानिमाञ्छृणु ॥ ५॥ टीका-नारीसंसर्ग शय्या उत्तमआसन वस्त्र धन यह सब मोक्षके प्रति विडम्बना हैं ताम्बूलसेवन रथ शिविका आदि सवारी राजऐश्वर्य भोग स्वर्ण रजत ताम्र अनेकप्रकारके रत्न गोधन आदिका संग्रह पा- ण्डित्य करना वेदशास्त्रमें तर्क करना नृत्य गीत भूषण वंशी वीणा मृदङ्गादिक वाद्य बजाना गज अश्व आदि वाहन स्त्री पुत्र केवल गुरूकी सेवा छोडके हे पार्वती यह जो कहा है सो भोगरूप विघ्न है अब धर्मरूप विघ्न कहतेहैं श्रवण करो ॥ ३ ॥ ४ ॥ ५ ॥ अथ धर्मरूपयोगविघ्नकथनम् । मूलम्-स्नानं पूजाविधिर्होमं तथा मोक्ष- मयी स्थितिः ॥ व्रतोपवासनियममौ-
( १२६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । नमिन्द्रियनिग्रहः॥६॥ध्येयो ध्यानं तथा मन्त्रो दानं ख्यातिर्दिशासु च ॥ वापीकूप- तडागादिप्रासादारामकल्पना ॥७॥ यज्ञं चान्द्रायणं कृच्छ्रं तीर्थानि विविधानि च॥ दृश्यन्ते च इमे विघ्ना धर्मरूपेण सं- स्थिताः ॥ ८ ॥ टीका-स्नानविधि पूजा होम और सुखपूर्वक स्थिति व्रत उपवास नियम मौन इन्द्रियनिग्रह ध्येय किसीका ध्यान करना मन्त्र जप दान सर्वत्र प्रसिद्धहोना वावडी कूप तालाब मंदिर बगीचाआदिक बनवाना यज्ञ करना पापक्षयके हेतु चांद्रायण कृच्छ्र व्रत करना तीर्थों में भ्रमण करना यह सब धर्मरूप विघ्न हैं ॥ ६॥७॥८॥ अथ ज्ञानरूपविघ्नकथनम् । मूलम्-यत्तु विघ्नंभवेज्ज्ञानं कथयामि वरा- नने ॥ ९॥ गोमुखं स्वासनं कृत्वा धौति- प्रक्षालनं च तत् ॥ नाडीसञ्चारविज्ञानं प्रत्याहारनिरोधनम्॥१०॥ कुक्षिसंचालनं क्षिप्रं प्रवेश इन्द्रियाध्वना ॥ नाडीकर्मा- णि कल्याणि भोजनं श्रूयता॑मम ॥११॥ टीका-हे देवी ! हे वरानने ! अब ज्ञानरूप विघ्न कहते हैं
पंचमपटलः । ( १२७ ) सुनो-अन्तःशुद्धिके अर्थ गोमुखके सदृश वस्त्र भक्षण करके तब धौति प्रक्षालन करना अर्थात् धौतियोग करना नाडीचालनका ज्ञान वायुका प्रत्याहार निरोध करना कुण्डलिनीके बोधार्थ उदरको भ्रमावना इन्द्रिय- द्वारा शीघ्र प्रवेश नाडीकर्म अर्थात् नाडीशुद्धिके हेतु आहारीय विचार यह सब ज्ञानरूप विघ्न हैं हेदेवी क- ल्याणी ! नाडीशुद्धिके अर्थ जो भोजनविधि है सो हम कहतेंहैं सुनो ॥ ९ ॥ १० ॥ ११ ॥ मूलम्-नवधातुरसं छिन्धि शुण्ठिकास्ता- डयेत्पुनः ॥ एककालं समाधिः स्याल्लिं- गभूतमिदं शृणु ॥ १२ ॥ टीका-नवीन रससहित भोजन वस्तु और शुण्ठी- चूर्ण भोजनकरे इससे शीघ्र समाधि होजायगी. हे देवी ! अब उसका चिह्न कहतेंहैं सुनो ॥ १२ ॥ मूलम्-सङ्गमं गच्छ साधूनां सङ्कोचं भज दुर्जनात् ॥ प्रवेशनिर्गमे वायौर्गुरुलक्षं विलोकयेत् ॥ १३ ॥ टीका-साधुके सङ्गकी अभिलाषा और दुर्जनसे अ- लग रहनेका विचार रखना और वायुके प्रवेश निर्गममें और वायुके निरोध समय मात्रासे गुरुलघुके विचा- रार्थ संख्या करना ॥ १३ ॥
( १२८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-पिण्डस्थं रूपसंस्थञ्च रूपस्थं रूप- वर्जितम् ॥ ब्रह्मैतस्मिन्मतावस्था हृदयञ्च प्रशाम्यति ॥ इत्येते कथिता विघ्ना ज्ञान- रूपे व्यवस्थिताः ॥ १४ ॥ टीका-शरीरस्थरूपका विचार रखना और रूप कु- रूपका निर्णय करना और यह जगत् ब्रह्म है ऐसे वि- चारसे हृदयमें स्थिरता रखना. हेपार्वती ! यह जो कहा है सो सब ज्ञानरूप विघ्न हैं ॥ १४ ॥ अथ चतुर्विधयोगकथनम् । मूलम्-मन्त्रयोगोहठश्चैव लययोगस्तृतीय- कः ॥ चतुर्थो राजयोगः स्यात्स द्विधा भाववर्जितः ॥ १५ ॥ टीका-योग चार प्रकारका है-मन्त्रयोग, हठयोग, और तीसरा लययोग और चौथा राजयोग है. यह राज- योग द्वैतभावसे रहित है अर्थात् राजयोग सिद्धहो जानेसे जीव ईश्वरमें लयहोजाता है और कुछ बोध नहीं होता ॥ १५ ॥ मूलम्-चतुर्धा साधको ज्ञेयो मृदुमध्याधि- मात्रकाः ॥ अधिमात्रतमः श्रेष्ठो भवा- ब्धौ लंघनक्षमः ॥ १६ ॥
पंचमपटलः । ( १२९ ) टीका-यह योगचतुष्टयके साधकभी चार प्रकारके होते हैं अर्थात् मृदु मध्यम अधिमात्र और अधिमात्र- तम यह अधिमात्रतम साधक सबमें श्रेष्ठ है यही सा- धक संसाररूपी समुद्रके पार होनेमें समर्थ होताहै॥१६॥ अथ मृदुसाधकलक्षणम् । मूलम्--मन्दोत्साही सुसंमूढो व्याधिस्थो गु- रुदूषकः ॥ लोभी पापमतिश्चैव बह्वाशी वनिताश्रयः ॥ १७ ॥ चपलः कातरो रोगी पराधीनोऽतिनिष्ठुरः ॥ मन्दाचारो मन्द- वीर्यो ज्ञातव्यो मृदुमानवः ॥ १८ ॥ द्वाद- शाब्दे भवेत्सिद्धिरेतस्य यत्नतः परम् ॥ मन्त्रयोगाधिकारी स ज्ञातव्यो गुरुणा ध्रुवम् ॥ १९ ॥ टीका-अब मृदुसाधकलक्षण कहते हैं मन्द उत्सा- ही मूढचित्त व्याधिग्रसित गुरुनिन्दक लोभी जिसकी सर्वदा पापबुद्धि रहै बहुत भोजन करनेवाला स्त्रीके वशमें हो चञ्चल हो कातर हो रोगी हो पराधीन हो कठोर बोलनेवाला हो जिसके मन्द कर्म हों मंदवीर्यवाला हो ऐसे पुरुषको मृदु. मानव कहते हैं यह मन्त्रयोगका अधिकारी है यत्नकरनेसे और गुरुकी कृपासे इसकोभी
( १३०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । बारह वर्षमें सिद्धि प्राप्त होगी ॥ १७ ॥ १८ ॥ १९ ॥ मूलम्-समबुद्धिः क्षमायुक्तः पुण्यकांक्षी प्रियंवदः॥ मध्यस्थः सर्वकार्येषु सामा- न्यः स्यान्न संशयः ॥ २० ॥ एतज्ज्ञात्वैव गुरुभिर्दीयते मुक्तितो लयः ॥ २१ ॥ टीका-अब मध्यसाधकलक्षण कहतेहैं-सामान्य बुद्धि हो क्षमावानहो पुण्यकर्म करनेमें इच्छा रखताहो प्रिय बोलताहो सर्वकार्यमें मध्यस्थ रहताहो अर्थात् न हर्ष न विषाद इसको मध्यसाधक कहतेहैं यह निश्च- य है गुरु इसको विचारके मुक्तिमार्ग जो लययोग है उसका उपदेश करे ॥ २० ॥२१ ॥ अथ अधिमात्रसाधकलक्षणम् । मूलम्-स्थिरबुद्धिर्लये युक्तः स्वाधीनो वी- र्यवानपि ॥ महाशयो दयायुक्तः क्षमावा- न् सत्यवानपि ॥२२॥ शूरो वयःस्थः श्र- द्धावान् गुरुपादाब्जपूजकः ॥ योगाभ्या- सरतश्चैव ज्ञातव्यश्चाधिमात्रकः ॥ २३ ॥ एतस्य सिद्धिः षड्वर्षेर्भवेदभ्यासयोग- तः ॥ एतस्मै दीयते धीरो हठयोगश्च साङ्गतः ॥ २४ ॥ टीका-अब अधिमात्र साधक लक्षण कहतेहैं स्थिर