भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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चतुर्थपटलः । (१२१) टीका-गुरूके उपदेशपूर्वक सर्वदा मूत्रत्यागनेके समय बलकरके वायुसे आकर्षणपूर्वक थोडा थोडा मूत्र त्यागकरे फिर ऊपरको आकर्षण करे तो उसका विन्दु सिद्ध होजायगा यह विन्दु की सिद्धी महासिद्धीकी दाता है अर्थात् परमपदको प्राप्त करती है ॥ १०१॥१०२॥ मूलम्-षण्मासमभ्यसेद्यो वै प्रत्यहं गुरु- शिक्षया ॥ शतांगनेपि भोगेपि तस्य बि- न्दुर्न नश्यति ॥ १०३ ॥ टीका-गुरूके शिक्षापूर्वक योगी यदि छः मास नि- त्य इसका अभ्यासकरे तो शत स्त्रीसे भोगकरेगा तो भी उसका विन्दुपात नहोगा ॥ १०३ ॥ मूलम्-सिद्धे बिन्दौ महायत्ने किं न सिद्ध्य- ति पार्वति ॥ ईशत्वं यत्प्रसादेन ममापि दुर्लभं भवेत् ॥ १०४ ॥ टीका-हेपार्वती ! जब महायत्नसे विन्दु सिद्ध होजा- यगा तब क्या नहीं सिद्धहोगा अर्थात् सब सिद्ध हो- जायगा इसके प्रसादसे यह दुर्लभ ईशत्व हमको प्राप्त भयाहै ॥ १०४ ॥ अथ शक्तिचालनमुद्रा । मूलम्-आधारकमले सुप्तां चालयेत्कुण्ड-