शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
पृष्ठ 131, कुल 216 में से
संदर्भ में पढ़ेंपंचमपटलः । ( १२७ ) सुनो-अन्तःशुद्धिके अर्थ गोमुखके सदृश वस्त्र भक्षण करके तब धौति प्रक्षालन करना अर्थात् धौतियोग करना नाडीचालनका ज्ञान वायुका प्रत्याहार निरोध करना कुण्डलिनीके बोधार्थ उदरको भ्रमावना इन्द्रिय- द्वारा शीघ्र प्रवेश नाडीकर्म अर्थात् नाडीशुद्धिके हेतु आहारीय विचार यह सब ज्ञानरूप विघ्न हैं हेदेवी क- ल्याणी ! नाडीशुद्धिके अर्थ जो भोजनविधि है सो हम कहतेंहैं सुनो ॥ ९ ॥ १० ॥ ११ ॥ मूलम्-नवधातुरसं छिन्धि शुण्ठिकास्ता- डयेत्पुनः ॥ एककालं समाधिः स्याल्लिं- गभूतमिदं शृणु ॥ १२ ॥ टीका-नवीन रससहित भोजन वस्तु और शुण्ठी- चूर्ण भोजनकरे इससे शीघ्र समाधि होजायगी. हे देवी ! अब उसका चिह्न कहतेंहैं सुनो ॥ १२ ॥ मूलम्-सङ्गमं गच्छ साधूनां सङ्कोचं भज दुर्जनात् ॥ प्रवेशनिर्गमे वायौर्गुरुलक्षं विलोकयेत् ॥ १३ ॥ टीका-साधुके सङ्गकी अभिलाषा और दुर्जनसे अ- लग रहनेका विचार रखना और वायुके प्रवेश निर्गममें और वायुके निरोध समय मात्रासे गुरुलघुके विचा- रार्थ संख्या करना ॥ १३ ॥