भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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( १२८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-पिण्डस्थं रूपसंस्थञ्च रूपस्थं रूप- वर्जितम् ॥ ब्रह्मैतस्मिन्मतावस्था हृदयञ्च प्रशाम्यति ॥ इत्येते कथिता विघ्ना ज्ञान- रूपे व्यवस्थिताः ॥ १४ ॥ टीका-शरीरस्थरूपका विचार रखना और रूप कु- रूपका निर्णय करना और यह जगत् ब्रह्म है ऐसे वि- चारसे हृदयमें स्थिरता रखना. हेपार्वती ! यह जो कहा है सो सब ज्ञानरूप विघ्न हैं ॥ १४ ॥ अथ चतुर्विधयोगकथनम् । मूलम्-मन्त्रयोगोहठश्चैव लययोगस्तृतीय- कः ॥ चतुर्थो राजयोगः स्यात्स द्विधा भाववर्जितः ॥ १५ ॥ टीका-योग चार प्रकारका है-मन्त्रयोग, हठयोग, और तीसरा लययोग और चौथा राजयोग है. यह राज- योग द्वैतभावसे रहित है अर्थात् राजयोग सिद्धहो जानेसे जीव ईश्वरमें लयहोजाता है और कुछ बोध नहीं होता ॥ १५ ॥ मूलम्-चतुर्धा साधको ज्ञेयो मृदुमध्याधि- मात्रकाः ॥ अधिमात्रतमः श्रेष्ठो भवा- ब्धौ लंघनक्षमः ॥ १६ ॥