भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पंचमपटलः । ( १२९ ) टीका-यह योगचतुष्टयके साधकभी चार प्रकारके होते हैं अर्थात् मृदु मध्यम अधिमात्र और अधिमात्र- तम यह अधिमात्रतम साधक सबमें श्रेष्ठ है यही सा- धक संसाररूपी समुद्रके पार होनेमें समर्थ होताहै॥१६॥ अथ मृदुसाधकलक्षणम् । मूलम्--मन्दोत्साही सुसंमूढो व्याधिस्थो गु- रुदूषकः ॥ लोभी पापमतिश्चैव बह्वाशी वनिताश्रयः ॥ १७ ॥ चपलः कातरो रोगी पराधीनोऽतिनिष्ठुरः ॥ मन्दाचारो मन्द- वीर्यो ज्ञातव्यो मृदुमानवः ॥ १८ ॥ द्वाद- शाब्दे भवेत्सिद्धिरेतस्य यत्नतः परम् ॥ मन्त्रयोगाधिकारी स ज्ञातव्यो गुरुणा ध्रुवम् ॥ १९ ॥ टीका-अब मृदुसाधकलक्षण कहते हैं मन्द उत्सा- ही मूढचित्त व्याधिग्रसित गुरुनिन्दक लोभी जिसकी सर्वदा पापबुद्धि रहै बहुत भोजन करनेवाला स्त्रीके वशमें हो चञ्चल हो कातर हो रोगी हो पराधीन हो कठोर बोलनेवाला हो जिसके मन्द कर्म हों मंदवीर्यवाला हो ऐसे पुरुषको मृदु. मानव कहते हैं यह मन्त्रयोगका अधिकारी है यत्नकरनेसे और गुरुकी कृपासे इसकोभी