शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थपटलः । ( ११३ ) नल विशेष प्रज्वलित होगा और रसकी वृद्धि उत्पन्न होगी ॥ ७५ ॥ मूलम्-अनेन सुतरां सिद्धिर्विग्रहस्य प्रजा- यते ॥ रोगाणां संक्षयश्चापि योगिनो भव- ति ध्रुवम् ॥ ७६ ॥ टीका-इस उड्डयानबंधके प्रभावसे योगीका शरीर आपही सिद्ध हो जायगा अर्थात् अमर होजायगा और सर्व रोगोंका निश्चय क्षय होजायगा ॥ ७६ ॥ मूलम्-गुरोर्लब्ध्वा प्रयत्नेन साधयेत्तु विच- क्षणः ॥ निर्जने सुस्थिते देशे बन्धं परम- दुर्लभम् ॥ ७७ ॥ टीका-गुरुसे यत्नपूर्वक इस परमदुर्लभ बन्धको लाभ करके बुद्धिमान् साधक एकांतस्थानमें स्वस्थ- चित्त होके साधन करे ॥ ७७ ॥ अथ वज्रोलीमुद्रा । मूलम्-वज्रोलीं कथयिष्यामि संसारध्वा- न्तनाशिनीम् ॥ स्वभक्तेभ्यः समासेन गुह्याद्गुह्यतमामपि ॥ ७८ ॥ टीका-हे देवी ! संसारतमनाशिनी परमगोपनीय वज्रोली मुद्रा भक्तलोगोंके प्रति हम कहते हैं ॥ ७८ ॥