भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पृष्ठ 116

( ११२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । खौघनाशनः ॥ ७२ ॥ उदरे पश्चिमं तानं नाभेरूर्ध्वं तु कारयेत् ॥ उड्ड्यानाख्यो- ऽत्र बन्धोयं मृत्युमातङ्गकेसरी ॥ ७३ ॥ टीका—नाभिसे ऊपर और नीचेको आकुञ्चन करे इसको उड्ड्यानबन्ध कहते हैं यह दुःखके समूहको नाशकरनेवाला है उदरको पीछे आकर्षण करे और नाभिसे ऊपर भागमें आकुञ्चन करे यह उड्ड्यानबन्ध है और मृत्युरूपी मातङ्गका नाशकरनेवाला यह बंध- रूपी सिंह है ॥ ७२ ॥ ७३ ॥ मूलम्-नित्यं यः कुरुते योगी चतुर्वारं दिने दिने॥ तस्य नाभेस्तु शुद्धिः स्याद्येन सिद्धो भवेन्मरुत् ॥ ७४ ॥ टीका-जो योगी नित्य इस बंधको चारवार अ- भ्यास करेगा उसका नाभिचक्र शुद्ध होके वायु सिद्ध होजायगा ॥ ७४ ॥ मूलम्-षण्मासमभ्यसन्योगी मृत्युं जयति निश्चितम् ॥ तस्योदराग्निर्ज्वलति रसवृ- द्धिः प्रजायते ॥ ७५ ॥ टीका-योगी यदि छः मास इस बंधका अभ्यास करे तो निश्चय मृत्युको जीतलेगा और उसका जठरा-