भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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( ११६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-बिन्दुंविधुमयो ज्ञेयो रजः सूर्यमय- स्तथा ॥ उभयोर्मेलनं कार्यं स्वशरीरे प्र- वेशयेत् ॥ ८६ ॥ टीका-बिन्दुरूपी चन्द्र और रजरूपी सूर्य यह जानकर दोनोंका सम्बन्ध करके अपने शरीरमें प्रवेश करना उचित है ॥ ८६ ॥ मूलम्-अहं बिन्दू रजः शक्तिरुभयोर्मेलनं यदा ॥ योगिनां साधनावस्था भवेद्दिव्यं वपुस्तदा ॥ ८७ ॥ टीका-यदि शिवरूपी बिन्दु और रजरूपी शक्ति यह दोनोंका सम्बन्ध होगा तब योगीका साधनसे दिव्य शरीर अर्थात् देवतोंके समान शरीर होगा तात्पर्य यह है कि शिवशक्ति अर्थात् माया ईश्वरके सम्बन्ध वा मायाको ईश्वरमें लय करनेसे जिसको अध्यारोप अप- वाद कहते हैं योगी मोक्ष होता है अभिप्राय यह है कि, रजविन्दुका सम्बन्ध जिस साधकको सिद्ध होजाताहै वह मुक्त है ॥ ८७ ॥ मूलम्-मरणं बिन्दुपातेन जीवनं बिन्दुधा- रणे ॥ तस्मादतिप्रयत्नेन कुरुते बिन्दुधा- रणम् ॥ ८८ ॥