भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पृष्ठ 119

चतुर्थपटलः । (११५) माचरेत् ॥ ८३ ॥ गुरूपदेशतो योगी हुंहु- ङ्कारेण योनितः ॥ अपानवायुमाकुंच्य बलादाकृष्य तद्रजः ॥ ८४ ॥ टीका-प्रथम बुद्धिमान् साधक यत्न करके विधान पूर्वक स्त्रीके योनिसे रजको लिङ्गनालमें आकर्षण क- रके अपने शरीरमें प्रवेश करे और अपने बिन्दुको नि- रोध करके लिङ्ग चालनकरे यदि दैवात् बिन्दु अपने स्थानसे चले तो योनिमुद्रासे निरोध करके ऊपरको आकर्षण करे और उस बिन्दुको वामभागमें स्थित क- रके क्षणमात्र लिङ्गचालन निवारण करे फिर गुरूपदे- शद्वारा योगी हुंहुंकार शब्द उच्चारणपूर्वक योनिमें लिङ्ग चालन करे और बलसे अपानवायुको आकुञ्चन करके स्त्रीके रजको आकर्षण करे इसको वज्रोली मुद्रा कहते हैं ॥ ८१ ॥ ८२ ॥ ८३ ॥ ८४ ॥ मूलम्-अनेन विधिना योगी क्षिप्रं योगस्य सिद्धये ॥ गव्यभुक्कुरुते योगी गुरुपा- दाब्जपूर्वकः ॥ ८५ ॥ टीका-इस विधानसे योगीको शीघ्र योग सिद्ध हो- गा और गुरुपादपद्मपूजक योगी शरीरस्थ अमृतपान करेगा ॥ ८५ ॥