भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पृष्ठ 138

( १३४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । ङ्गणे ॥ तदा जयं सभायाञ्च युद्धे निर्जित्य सञ्चरेत् ॥ ३३ ॥ टीका-जब सम्पूर्ण अपना प्रतिबिम्ब आकाशमें देखे तब सभामें उसकी जय होय और युद्धमें शत्रुको जीतलेगा ॥ ३३ ॥ मूलम्-यः करोति सदाभ्यासं चात्मानं वन्दते परम् ॥ पूर्णानन्दैकपुरुषं स्वप्रती- कप्रसादतः ॥ ३४ ॥ टीका-जो सर्वदा स्वप्रतीक उपासनाका अभ्यास करे तो उसको आत्माकी प्राप्ति होगी और उसी स्वप्र- तीकके प्रसादसे पूर्णानन्द स्वरूप अर्थात् आत्माका दर्शन होगा. तात्पर्य यह है कि जब हृदयाकाशमें अपने स्वरूपका अनुभव होगा तब आत्माकी परम ज्योतिका प्रकाश होगा ॥ ३४ ॥ मूलम्-यात्राकाले विवाहे च शुभे कर्मणि सङ्कटे ॥ पापक्षये पुण्यवृद्धौ प्रतीकोपा- सनञ्चरेत् ॥ ३५ ॥ टीका-यात्राकालमें और विवाहके समयमें और शुभकर्ममें और पापक्षयमें और पुण्यवृद्धिके अर्थ स्वप्र- तीक अर्थात् अपने प्रतिबिम्बका दर्शन करे तो सर्वदा कल्याण होगा ॥ ३५ ॥