शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचमपटलः । ( १४५ ) मूलम्-सर्वान् भूतान् जयं कृत्वा निराशी- रपरिग्रहः ॥ ६८ ॥ नासाग्रे दृश्यते येन पद्मासनगतेन वै ॥ मनसो मरणं तस्य खेचरत्वं प्रसिद्ध्यति ॥ ६९ ॥ टीका-योगी सर्व भूतोंको जय करके और क्षुधा और इच्छाको जीतके पद्मासनसे स्थितहोके जो ना- साग्रमें देखता है उसका मन स्थिर होजाताहै तब खे- चरत्व सिद्धहोताहै ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ मूलम्-ज्योतिः पश्यति योगीन्द्रः शुद्धं शुद्धाचलोपमम् ॥ तत्राभ्यासबलेनैव स्वयं तद्रक्षको भवेत् ॥ ७० ॥ टीका-शुद्ध अचलके समान परमज्योति योगी दे- खताहै तब अभ्यासबलसे आपही उसका रक्षक होताहै अर्थात् ज्योतिर्मय होता है ॥ ७० ॥ मूलम्-उत्तानशयने भूमौ सुप्त्वा ध्यायन्नि- रन्तरम् ॥सद्यः श्रमविनाशाय स्वयं योगी विचक्षणः ॥७१॥ शिरः पश्चात्तु भागस्य ध्याने मृत्युञ्जयो भवेत् ॥ भ्रूमध्ये दृष्टि- मात्रेण ह्यपरः परिकीर्तितः ॥ ७२ ॥