शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १४६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-बुद्धिमान् योगी भूमिमें उत्तानशयन करके निरन्तर ध्यान करे तो तत्काल आपही श्रमका नाश होजायगा और शिरके पृष्ठभागका ध्यान करनेसे योगी मृत्युका जीतनेवाला होजायगा और भ्रूके मध्यमें जो दृष्टिमात्रसे फल होताहै सो हेदेवि ! हम पहले कह- चुके हैं ॥ ७१ ॥ ७२ ॥ मूलम्-चतुर्विधस्य चान्नस्य रसस्त्रेधा वि- भज्यते ॥ तत्र सारतमो लिंगदेहस्य परि- पोषकः ॥ ७३ ॥ सप्तधातुमयं पिण्डमे- ति पुष्णाति मध्यगः ॥ याति विण्मूत्र- रूपेण तृतीयः सप्ततो बहिः ॥७४॥ आ- द्यभागद्वयं नाड्यः प्रोक्तास्ताः सकला अपि ॥ पोषयन्ति वपुर्वायुमापादतल- मस्तकम् ॥ ७५ ॥ टीका-चार विधि अन्नभोजन करनेसे तीनप्रकार- का रस उत्पन्नहोताहै उसमें जो प्रथम सारभूत रस है वह लिङ्गशरीरको पोषण करता है और जो दूसरा रस है वह सप्तधातुमय पिण्डको पोषण करताहै और तीसरा रस सप्तधातुके बाहर मल मूत्ररूप है पहिले जो दोभाग रस कहाहै वही सकल नाडीरूप है और