भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पृष्ठ 154

(१५०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । शारच्चन्द्रके समान प्रकाशमान तेज है और वह आप- ही कोटि सूर्यके समान प्रकाश और कोटिचन्द्रके समान शीतल है यह तीनों मिलके अर्थात् कुण्डलिनी सुषुम्णा, बीजकुण्डलिनीका नाम त्रिपुरभैरवी देवी है यह कुण्ड- लिनी परमतेजमानहै और उसकी बीजसंज्ञाहै॥८४॥८५॥ मूलम्--क्रियाविज्ञानशक्तिभ्यां युतं यत्प- रितो भ्रतत्॥८६॥ उत्तिष्ठद्दिशतस्त्वम्भः सूक्ष्मं शोणशिखायुतम्॥योनिस्यं तत्परं तेजः स्वयंभूलिंगसंज्ञितम् ॥ ८७ ॥ टीका--वह बीज क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्तिसे युक्त होके शरीरमें भ्रमण करताहै और कभी ऊर्ध्वगामी हो- ताहै और कभी जलमें प्रवेश करताहै और सूक्ष्म प्रज्व- लित अग्निके समान शिखायुत परमतेजवीर्यकी स्थिति योनिस्यानमें है और स्वयम्भू लिङ्गसंज्ञा है॥८६॥८७॥ मूलम्--आधारपद्ममेतद्धि योनिर्यस्यास्ति कन्दतः ॥ परिस्फुरद्वादिसान्तचतुर्वर्ण चतुर्दलम् ॥ ८८ ॥ टीका--यह जो कहाहै इसको आधारपद्म कहते हैं और इस पद्मके मूलमें योनिकी स्थितिहै यह पद्म परम प्रकाशमान-व-से स-तक अर्थात् व-श-ष-स चारवर्ण और चारदल करके शोभित है ॥ ८८ ॥