भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पंचमपटलः । ( १५१ ) मूलम्-कुलाभिधं सुवर्णाभं स्वयम्भू‌लि- ङ्गसंगतम् ॥ द्विरण्डो यत्र सिद्धोऽस्ति डाकिनी यत्र देवता ॥८९॥ तत्पद्ममध्य- गा योनिस्तत्र कुण्डलिनी स्थिता ॥ त- स्याऊर्ध्वे स्फुरत्तेजः कामबीजं भ्रमन्मत- म् ॥ ९०॥ यः करोति सदा ध्यानं मूला- धारे विचक्षणः ॥ तस्य स्याद्दार्दुरी सिद्धि- र्भूमित्यागक्रमेण वै ॥ ९१ ॥ टीका-यह कमल कुलाभिध है अर्थात् कुलनाम है और स्वर्णके समान कांतिहै और स्वयंभूलिङ्गसे युक्त है और उस पद्ममें द्विरण्डनामक सिद्ध और डाकिनी देवता अधिष्ठात्री है और गणेश देवता है और उस पद्मके मध्यमें योनि है उस योनिमें कुण्डलिनीकी स्थि- तिहै और उस कुण्डलिनीके ऊपर दीप्तिमान् तेजस्व- रूप कामबीज भ्रमण करताहै जो बुद्धिमान् पुरुष इस मूलाधार पद्मका सर्वदा ध्यान करते हैं उनको दार्दुरी वृत्ति सिद्ध होती है और क्रमसे भूमिको त्यागके आ- काशगमन करते हैं ॥ ८९ ॥ ९० ॥ ९१ ॥ मूलम्-वपुषः कान्तिरुत्कृष्टा जठराग्निविव-