शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १५२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । र्धनम् ॥ आरोग्यञ्च पटुत्वञ्च सर्वज्ञत्वञ्च जायते ॥ ९२ ॥ टीका-यह ध्यान करनेसे शरीरमें उत्तम कांति होती है और जठराग्नि वर्धित होताहै और शरीर आरोग्य रहताहै और पटुता और सर्वज्ञता अर्थात् सर्व वस्तुका ज्ञान उत्पन्न होता है ॥ ९२ ॥ मूलम्-भूतं भव्यं भविष्यञ्च वेत्ति सर्वं सका- रणम् ॥ अश्रुतान्यपि शास्त्राणि सरहस्यं वदेद्ध्रुवम् ॥ ९३ ॥ टीका-फिर भूत, भविष्य, वर्तमान तीनोंकाल और सर्व वस्तुके कारणका ज्ञान होताहै और जो शास्त्र कभी श्रवण नहीं कियाहै उसको रहस्यसहित व्या- ख्या करनेकी शक्ति निश्चय उत्पन्न होती है ॥ ९३ ॥ मूलम्-वक्त्रे सरस्वती देवी सदा नृत्यति नि- र्भरम् ॥ मन्त्रसिद्धिर्भवेत्तस्य जपादेव न संशयः ॥ ९४ ॥ टीका-योगीके मुखमें सर्वदा निरंतर सरस्वती दे- वी नृत्य करती है और योगीकी जपमात्रसे मन्त्रादिकी सिद्धि होती है इसमें संशय नहीं है ॥ ९४ ॥ मूलम्-जरामरणदुःखौघान्नाशयति गुरोर्व-