शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १५६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-जो पुरुष यह दिव्य स्वाधिष्ठानपद्मका सर्वदा ध्यान करते हैं उनको कामरूपिणी स्त्री कामसे मोहित होके भजतीहैं अर्थात् सेवा करती हैं ॥ १०५ ॥ मूलम्-विविधञ्चाश्रुतं शास्त्रं निःशङ्को वै व- देद्ध्रुवम् ॥ सर्वरोगविनिर्मुक्तो लोके चरति निर्भयः ॥ १०६ ॥ टीका-विविधशास्त्र जो कभी श्रवण नहीं किय हो उसकोभी इस पद्मके ध्यानके प्रभावसे निःशंक कहेगा और सर्वरोगसे मुक्तहोके आनन्दपूर्वक संसारमें विचरेगा ॥ १०६ ॥ मूलम्-मरणं खाद्यते तेन स केनापि न खा- द्यते ॥ तस्य स्यात्परमा सिद्धिरणिमादि- गुणप्रदा ॥१०७॥ वायुः सञ्चरते देहे रस- वृद्धिर्भवेद्ध्रुवम् ॥ आकाशपङ्कजगलत्पीय़ू- षमपि वर्द्धते ॥ १०८ ॥ टीका-यह साधक मृत्युको नाश करदेताहै और वह किसीसे नष्ट नहीं होता और उस साधकको गुण देनेवाली अणिमादि सिद्धि प्राप्त होती हैं और उसके शरीरमें वायु संचार करताहै अर्थात् सुषुम्णामें प्रवेश करताहै और निश्चय रसकी वृद्धि होतीहै और सह-