शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचमपटलः । ( १५७ ) षद्दलकमलसे जो अमृत स्रवताहै उसकी वृद्धि होती है ॥ १०७ ॥ १०८ ॥ अथ मणिपूरचक्रविवरणम् । मूलम्-तृतीयं पङ्कजं नाभौ मणिपूरकसंज्ञ- कम्॥दशारंडादिफान्तार्ण शोभितं हेमवर्ण कम् ॥ १०९॥ रुद्राख्यो यत्र सिद्धोऽस्ति सर्वमङ्गलदायकः ॥ तत्रस्था लाकिनी- नाम्नी देवी परमधार्मिका ॥ ११० ॥ टीका-मणिपूरनामक तीसरा पद्म जो नाभिस्थलमें है वह हेमवर्ण दशदलकरके शोभितहै और-ड-से फ-तक अर्थात् ड-ढ-ण-त-थ-द-ध-न-प-फ-यह दश- वर्णसे युक्त है और उस स्थानमें सर्वमंगलदाता रु- द्रनामक सिद्ध और लाकिनी देवी अधिष्ठात्री और विष्णुदेवता हैं ॥ १०९ ॥ ११० ॥ मूलम्-तस्मिन् ध्यानं सदा योगी करोति मणिपूरके ॥ तस्य पातालसिद्धिः स्यान्नि- रन्तरसुखावहा ॥१११॥ ईप्सितञ्च भवे- ल्लोके दुःखरोगविनाशनम् ॥ कालस्य व- ञ्चनञ्चापि परदेहप्रवेशनम् ॥ ११२ ॥ टीका-जो साधक इस मणिपूरचक्रको सर्वदा ध्या-