भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

पंचमपटलः । ( १५७ ) षद्दलकमलसे जो अमृत स्रवताहै उसकी वृद्धि होती है ॥ १०७ ॥ १०८ ॥ अथ मणिपूरचक्रविवरणम् । मूलम्-तृतीयं पङ्कजं नाभौ मणिपूरकसंज्ञ- कम्॥दशारंडादिफान्तार्ण शोभितं हेमवर्ण कम् ॥ १०९॥ रुद्राख्यो यत्र सिद्धोऽस्ति सर्वमङ्गलदायकः ॥ तत्रस्था लाकिनी- नाम्नी देवी परमधार्मिका ॥ ११० ॥ टीका-मणिपूरनामक तीसरा पद्म जो नाभिस्थलमें है वह हेमवर्ण दशदलकरके शोभितहै और-ड-से फ-तक अर्थात् ड-ढ-ण-त-थ-द-ध-न-प-फ-यह दश- वर्णसे युक्त है और उस स्थानमें सर्वमंगलदाता रु- द्रनामक सिद्ध और लाकिनी देवी अधिष्ठात्री और विष्णुदेवता हैं ॥ १०९ ॥ ११० ॥ मूलम्-तस्मिन् ध्यानं सदा योगी करोति मणिपूरके ॥ तस्य पातालसिद्धिः स्यान्नि- रन्तरसुखावहा ॥१११॥ ईप्सितञ्च भवे- ल्लोके दुःखरोगविनाशनम् ॥ कालस्य व- ञ्चनञ्चापि परदेहप्रवेशनम् ॥ ११२ ॥ टीका-जो साधक इस मणिपूरचक्रको सर्वदा ध्या-

( १५८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । न करतेहैं सो सर्वसिद्धिदात्री जो पातालसिद्धि है उसको लाभ करते हैं और उनका दुःख रोगविनाश होके सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं और कालको नि- रादर कर देतेहैं और परदेहमें प्रवेश करनेकी शक्ति उत्पन्न होती है ॥ १११ ॥ ११२ ॥ मूलम्-जाम्बूनदादिकरणं सिद्धानां दर्शनं भवेत् ॥ ओषधीदर्शनञ्चापि निधीनां द- र्शनं भवेत् ॥ ११३ ॥ टीका-यह साधकको सुवर्णआदि रचना करनेकी शक्ति होतीहै और देवतोंका दर्शन और निधि और ओषधीका दर्शन होताहै ॥ ११३ ॥ मूलम्-हृदयेऽनाहतंनाम चतुर्थं पङ्कजं भ- वेत् ॥११४॥ कादिठान्तार्णसंस्थानं द्वाद- शारसमन्वितम् ॥ अतिशोणं वायुबीजं प्रसादस्थानमीरितम् ॥ ११५ ॥ टीका-हृदयस्थानमें जो अनाहतनामक चतुर्थ पद्म है वह-क-से-ठ-तक अर्थात् क-ख-ग-घ-ङ-च-छ- ज-झ-ञ-ट-ठ-यह बारह वर्ण और बारहदलसे युक्त है और अति उज्ज्वल रक्तवर्णसे शोभायमान है और

पंचमपटलः । ( १५९ ) वह प्रसन्नस्थान वायुका बीज अर्थात् प्राणवायुका आधार है ॥ ११४ ॥ ११५ ॥ मूलम्-पद्मस्थं तत्परं तेजो बाणलिंगं प्रकीर्तितम् ॥ यस्य स्मरणमात्रेण दृष्टा- दृष्टफलं लभेत् ॥ ११६ ॥ टीका-उस हृदयकमलमें जो परमतेज है उसीको बाणलिङ्ग कहते हैं जिसके ध्यानमात्रसे साधक इस लोक और परलोकका उत्तमफल आनंदपूर्वक लाभ करते हैं ॥ ११६ ॥ मूलम्-सिद्धः पिनाकी यत्रास्ते काकिनी यत्र देवता ॥ एतस्मिन्सततं ध्यानं हृ- त्पाथोजे करोति यः ॥ क्षुभ्यन्ते तस्य कान्ता वै कामार्ता दिव्ययोषितः ॥११७॥ टीका-जिस पद्ममें पिनाकी, सिद्ध और काकिनी देवी अधिष्ठात्री हैं उस हृदयस्थपद्ममें जो साधक सर्वदा ध्यान करताहै उसके समीप कामार्ता सुन्दर स्त्री अप्सरा आदि मोहित होजाती हैं ॥ ११७ ॥ मूलम्-ज्ञानञ्चाप्रतिमं तस्य त्रिकालवि- षयम्भवेत् ॥ दूरश्रुतिर्दूरदृष्टिः स्वेच्छया खगतां व्रजेत् ॥ ११८ ॥

( १६० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेत । टीका-उस साधकको अपूर्वज्ञान उत्पन्न होताहै और त्रिकालदर्शी होताहै और दूरशब्द श्रवण करने और दूरकी सूक्ष्मवस्तु देखनेकी शक्ति उत्पन्न होतीहै और स्वेच्छासे आकाशमें गमन करताहै ॥ ११८॥ मूलम्-सिद्धानां दर्शनञ्चापि योगिनीदर्शनं तथा ॥ भवेत्खेचरसिद्धिश्च खेचराणां जयन्तथा॥११९॥यो ध्यायति परं नित्यं बाणलिंगं द्वितीयकम् ॥ खेचरी भूचरी सिद्धिर्भवेत्तस्य न संशयः ॥ १२० ॥ टीका-जो साधक यह दूसरे परमबाणलिङ्गका नि- त्य ध्यान करताहै उसको देवता और योगिनीका दर्शन होताहै और आकाशमें गमन करनेकी शक्ति होजाती है और आकाशगामीसे जय प्राप्त होतीहै और खेचरी भूचरी सिद्ध होती है इसमें संशय नहीं है ॥११९ ॥१२०॥ मूलम्-एतद्ध्यानस्य माहात्म्यं कथितुं नै- व शक्यते॥ ब्रह्माद्याः सकला देवा गोपा- यन्ति परन्त्विदम् ॥ १२१ ॥ टीका-हे देवी ! इस अनाहत पद्मके ध्यानके माहात्म्य- को कोई नहीं कहसकता और इस ध्यानको ब्रह्मा आदि सकलदेवता गोप्य रखते हैं ॥ १२१ ॥

पंचमपटलः । ( १६१ ) अथ विशुद्धचक्रविवरणम् । मूलम्-कण्ठस्थानस्थितं पद्मं विशुद्धं नाम- पञ्चमम् ॥ १२२ ॥ सुहेमाभं स्वरोपेतं षोडशस्वरसंयुतम् ॥ छगलाण्डोऽस्ति सिद्धोत्र शाकिनी चाधिदेवता ॥ १२३ ॥ टीका-कंठस्थानमें जो पांचवां विशुद्धनामक क- मल है वह स्वर्णके समान कांतिसे शोभित है और सो- लह स्वर अर्थात् अ-आ-इ-ई-उ-ऊ-ऋ-ॠ-ऌ-ॡ-ए-ऐ- ओ-औ-अं-अः-से युक्त है और छगलांड सिद्ध और शा- किनीदेवी अधिष्ठात्री और जीवात्मा देवता इस स्थान- में सदा विराजमान हैं ॥ १२२ ॥ १२३ ॥ मूलम्-ध्यानं करोतियो नित्यं स योगीश्व- रपण्डितः॥ किन्त्वस्य योगिनोऽन्यत्र वि- शुद्धाख्ये सरोरुहे ॥ चतुर्वेदा विभासन्ते सरहस्या निधेरिव ॥ १२४ ॥ टीका-जो पुरुष इस विशुद्धपद्मका नित्य ध्यान करतेहैं सो योगीश्वर पंडित हैं और इस विशुद्धपद्ममें उस पुरुषको चारोंवेद रहस्यसहित समुद्रके रत्नवत् प्रकाश होते हैं ॥ १२४ ॥ मूलम्-इहस्थाने स्थितो योगी यदा क्रोध-

( १६२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । वशो भवेत् ॥तदा समस्तं त्रैलोक्यं कम्प- ते नात्र संशयः ॥ १२५ ॥ टीका-यह विशुद्धपद्ममें जब योगी मन और प्रा- णको स्थित करके यदि क्रोध करे तो अवश्य चराचर त्रैलोक्य कम्पायमान होजाय इसमें सन्देह नहीं ॥१२५॥ मूलम्-इह स्थाने मनो यस्य दैवायाति लयं यदा ॥ तदा बाह्यं परित्यज्य स्वा- न्तरे रमते ध्रुवम् ॥ १२६ ॥ टीका-यह कमलमें साधकका मन दैवात् जब लय होताहै तब सकल बाह्यविषयको त्यागके योगी- का मन और प्राण शरीरके अंतरहीमें निश्चय रमण करताहै ॥ १२६ ॥ मूलम्-तस्य न क्षतिमायाति स्वशरीरस्य शक्तिः ॥ संवत्सरसहस्रेऽपि वज्रातिक- ठिनस्य वै ॥ १२७॥ यदा त्यजति त- द्ध्यानं योगींद्रोऽवनिमण्डले ॥ तदा वर्ष- सहस्राणि मन्यते तत्क्षणं कृती ॥ १२८ ॥ टीका-उस योगीका शरीर वज्रसेभी कठोर होजा- ताहै और उसको स्वशरीरकी शक्तिसे किसीप्रकारकी हानि नहीं होतीहै और सहस्रवर्ष समाधिके पीछे जब

पंचमपटलः । ( १६३ ) उस ध्यानको छोडके योगीकी चित्तवृत्ति संसारमें आ- वेगी तब उस सहस्रवर्षके योगी एकक्षण व्यतीत भया मानेगा ॥ १२७ ॥ १२८ ॥ अथ आज्ञाचक्रविवरणम् । मूलम्--आज्ञापद्मं भ्रुवोर्मध्ये हक्षोपेतं द्विप- त्रकम्॥शुक्लाभं तन्महाकालः सिद्धो दे- व्यत्र हाकिनी ॥ १२९ ॥ टीका-भ्रूके मध्यमें जो आज्ञापद्म है उसमें हं-क्षं- दो बीज हैं और सुंदर श्वेतवर्ण दो पत्र हैं और उस स्था- नमें महाकाल सिद्ध है और हाकिनीदेवी अधिष्ठात्री और परमात्मा देवता है ॥ १२९ ॥ मूलम्-शरच्चंद्रनिभं तत्राक्षरबीजं विजृंभितं॥ पुमान् परमहंसोऽयं यज्ज्ञात्वा नावसी- दति ॥ १३०॥ तत्र देवः परन्तेजः सर्वत- न्त्रेषु मन्त्रिणः ॥ चिन्तयित्वा परां सिद्धिं लभते नात्र संशयः ॥ १३१ ॥ टीका-उस आज्ञापद्मके मध्यमें शरच्चंद्रके समा- न परमतेज चंद्रबीज अर्थात् . ठं बीज विराजमान है इसके ज्ञान होनेसे परमहंस पुरुषको कभी कष्ट नहीं होता यह परमतेजका प्रकाश सर्वतंत्रों करके गो-

( १६४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेत । पित है इसके चिंतनमात्रसे अवश्य परम सिद्धिलाभ होताहै ॥ १३० ॥ १३१ ॥ मूलम्-तुरीयं त्रितयं लिंगं तदाहं मुक्तिदा- यकः ॥ ध्यानमात्रेण योगीन्द्रो मत्समो भवति ध्रुवम् ॥ १३२ ॥ टीका-हे पार्वती ! उस स्थानमें तुरीया तृतीयलिंग हमीं मुक्तिके दाता हैं इसके ध्यानमात्रसे योगीन्द्र निश्चय हमारे तुल्य होजायगा ॥ १३२ ॥ मूलम्-इडा हि पिंगला ख्याता वरणासीति होच्यते ॥ वाराणसी तयोर्मध्ये विश्वना- थोत्र भाषितः ॥ १३३ ॥ टीका-इस शरीरमें जो दो इडा और पिंगला ना- डी हैं उनको वरणा और असी कहते हैं यह वरणा और असीके मध्यमें स्वयं विश्वनाथजी विराजमान हैं. ता- त्पर्य यह है कि , यह इडा और पिंगलाके मध्यमें जो स्थानहै उसीको शिवजीने वाराणसी कहाहै ॥ १३३ ॥ मूलम्-एतत्क्षेत्रस्य माहात्म्यमृषिभिस्त- तत्त्वदर्शिभिः ॥ शास्त्रेषु बहुधा प्रोक्तं परं तत्त्वं सुभाषितम् ॥ १३४ ॥ टीका-यह वाराणसी क्षेत्रके माहात्म्यको तत्त्वद-

पंचमपटलः । ( १६५ ) र्शी ऋषिलोगोंने अनेक शास्त्रोंमें बहुत प्रकारसे परम- तत्त्व कहाहै ॥ १३४ ॥ मूलम्-सुषुम्णा मेरुणा याता ब्रह्मरन्ध्रं य- तोऽस्ति वै ॥ ततश्चैषा परावृत्त्य तदाज्ञा- पद्मदक्षिणे ॥ १३५ ॥ वामनासापुटं या- ति गंगेति परिगीयते ॥ १३६ ॥ टीका-सुषुम्नानाडी मेरुदंडद्वारा जहां ब्रह्मरन्ध्र है उस स्थानमें गई है और इडानाडी मेरुतक जायके लौटीहै और आज्ञाचक्रके दक्षिणभाग होके वामनासापु- टको गई है इसको गङ्गा कहतेहैं ॥ १३५ ॥ १३६ ॥ मूलम्--ब्रह्मरन्ध्रे हि यत्पद्मं सहस्रारं व्यव- स्थितम्॥तत्र कन्देहि या योनिस्तस्यां च- न्द्रो व्यवस्थितः ॥१३७॥ त्रिकोणाकार- तस्तस्याः सुधा क्षरति सन्ततम्॥इडाया- ममृतं तत्र समं स्रवति चन्द्रमाः॥१३८॥ अमृतं वहति द्वारा धारारूपं निरन्तरम् ॥ वामनासापुटं याति गंगेत्युक्ता हि यो- गिभिः ॥ १३९ ॥ टीका-ब्रह्मरन्ध्रमें जो सहस्रदल पद्म है उस पद्मके कन्दमें योनि है उस योनिमें चन्द्रमा विराजमान है

( १६६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । और वही त्रिकोणाकार योनीसे चन्द्रविगलित अमृत सर्वदा स्रवता है सो अमृत चंद्रमासे इडानाडीद्वारा समभावसे निरन्तर धारारूप गमन करता है और उस इडानाडीकी गति वामनासापुटमें है उस हेतुसे योगी लोग इस नाडीको गंगा कहतेहैं ॥१३७॥१३८॥१३९॥ मूलम्-आज्ञापङ्कजदक्षांसाद्वामनासापुटंग- ता ॥ उदग्वहेति तन्नेडा गंगेति समुदा- हृता ॥ १४० ॥ टीका-वह इडानाडी आज्ञापद्मके दक्षिणभागसे वामनासापुटको गमन करती है इसीको उदग्वाहिनी गंगा कहते हैं ॥ १४०॥ मूलम्-ततो द्वयोर्हि मध्ये तु वाराणसी वि- चिन्तयेत् ॥ तदाकारा पिंगलापि तदाज्ञा- कमलोत्तरे ॥ दक्षनासापुटे याति प्रोक्ता- स्माभिरसीति वै ॥ १४१ ॥ टीका-यह इडा और पिङ्गलाके मध्यस्थानको वाराणसी चिन्तनाकरे और इडानाडीके 'समान पि- ङ्गलाभी उस आज्ञाकमलके वामभागसे दक्ष नासा- पुटको गई है इस हेतुसे हेदेवी ! इस पिङ्गलाको हमने असी कहाहै ॥ १४१ ॥

पंचमपटलः । ( १६७ ) मूलम्-मूलाधारे हि यत्पद्मं चतुष्पत्रं व्यव- स्थितम्॥तत्र कन्देस्ति या योनिस्तस्यां सूर्यो व्यवस्थितः ॥ १४२ ॥ टीका-जो मूलाधारपद्म चारदलसे युक्तहै उस कमल- के कन्दमें जो योनिहै इस योनिमें सूर्यस्थितहै ॥१४२॥ मूलम्-तत्सूर्य्यमण्डलद्वाराद्विषं क्षरति सन्ततम्॥ १४३॥ पिंगलायां विषं तत्र सम- र्पयति तापनः ॥ विषं तत्र वहन्ती या धा- रारूपं निरन्तरम् ॥ दक्षनासापुटे याति कल्पितेयन्तु पूर्ववत् ॥ १४४ ॥ टीका-वही सूर्य्यमण्डलसे निरन्तर विष स्रवताहै और पिङ्गलाद्वारा गमन करताहै और वह विष सर्वदा धारारूप पिङ्गलानाडीसे प्रवाहित रहताहै और यह पिङ्गलानाडी दक्षिणनासापुटमें गईहै ॥ १४३ ॥१४४॥ मूलम्-आज्ञापङ्कजवामास्याद्दक्षनासापुटं गता ॥ उदग्वहांपिंगलांपि पुरासीति प्रकीर्तिता ॥ १४५ ॥ टीका-यह नाडी आज्ञाकमलके वामभागसे दक्षिण नासिकापुटको गई है इस हेतुसे यह पिङ्गलानाडीको असी कहते हैं ॥ १४५ ॥

( १६८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-आज्ञापद्ममिदं प्रोक्तं यत्र देवो महे- श्वरः ॥ १४६ ॥ पीठत्रयं ततश्चोर्ध्वं निरु- क्तं योगचिन्तकैः ॥ तद्विन्दुनादशक्त्या- ख्यं भालपद्मे व्यवस्थितम् ॥ १४७ ॥ टीका-इस स्थानमें महेश्वर देवताहै इसको आज्ञापद्म कहते हैं और योगचिन्तक लोग कहते हैं कि, इस पद्मके ऊपर पीठत्रयकी स्थिति है अर्थात् नाद, बिंदु, शक्ति, यह तीनों इस भालपद्ममें विराज- मान हैं ॥ १४६ ॥ १४७ ॥ मूलम्-यः करोति सदा ध्यानमाज्ञापद्मस्य गोपितम् ॥ पूर्वजन्मकृतं कर्म विनश्येद- विरोधतः ॥ १४८ ॥ ॥ टीका-जो पुरुष सर्वदा गोपित करके इस आज्ञा- कमलका ध्यान करते हैं उनका पूर्वजन्मकृत कर्मफल सकल निर्विघ्न नाश होजाताहै ॥ १४८ ॥ मूलम्-इह स्थितः सदा योगी ध्यानं कुर्या- न्निरन्तरम् ॥ तदा करोति प्रतिमां प्रति- जापमनर्थवत् ॥ १४९॥ टीका-जब योगी यह ध्यान सर्वदा निरन्तर करे

पंचमपटलः । (१६९) तो उसका प्रतिमापूजन करना वा जप करना सर्वथा अनर्थवत् है ॥ १४९ ॥ मूलम्-यक्षराक्षसगन्धर्वा अप्सरोगणकिन्न- राः ॥ सेवन्ते चरणौ तस्य सर्वे तस्य व- शानुगाः ॥ १५० ॥ टीका-यक्ष और राक्षस और गन्धर्व और अप्सरा और किन्नर आदि सब इस ध्यानयुक्त योगीके वशमें होजाते हैं और उसके चरणकी सेवा करते हैं ॥१५०॥ मूलम्-करोति रसनां योगी प्रविष्टां विपरी- तगाम्॥ लम्बिकोर्ध्वेषु गर्तेषु धृत्वा ध्या- नं भयापहम् ॥ १५१ ॥ अस्मिन् स्था- ने मनो यस्य क्षणार्धं वर्ततेऽचलम् ॥ तस्य सर्वाणि पापानि संक्षयं यान्ति तत्क्ष- णात् ॥ १५२ ॥ टीका-जो योगी विपरीतगामी जिह्वाको ऊपर तालूमूलमें प्रवेश करके यह भयनाशक आज्ञाकमल- का ध्यान अर्धक्षणभी मन अचल स्थिरतापूर्वक करते हैं उनका सकल पातक उसीक्षण नाश होजाताहै ॥ १५१ ॥ १५२ ॥ मूलम्-यानि यानि हि प्रोक्तानि पंचपद्मे फ-

लानि वै॥ तानि सर्वाणि सुतरामेतज्ज्ञा- नाद्भवन्ति हि ॥ १५३ ॥ टीका -पंच पद्मका जो जो फल पहिले कहाहै सो सबका समस्त फल आपही इस आज्ञाकमलके ध्यान- सेही प्राप्त होजायगा ॥ १५३ ॥ मूलम्--यः करोति सदाभ्यासमाज्ञापद्मे वि- चक्षणः॥ वासनाया महाबन्धं तिरस्कृ- त्य प्रमोद्ते ॥ १५४ ॥ टीका-जो बुद्धिमान् सर्वदा मन स्थिर करके यह आज्ञापद्मका अभ्यास करते हैं वह वासनारूपी महा- बन्धको निरादर करके आनन्द लाभ करते हैं ॥१५४॥ मूलम्-प्राणप्रयाणसमये तत्पद्मं यः स्मर- न्सुधीः॥ त्यजेत्प्राणं स धर्मात्मा परमा- त्मनि लीयते ॥ १५५ ॥ टीका-जो बुद्धिमान् मृत्युके समय उस आज्ञापद्म- का ध्यान करेगा सो धर्मात्मा प्राणको त्यागके परमा- त्मामें लय होजायगा ॥ १५५ ॥ मूलम्-तिष्ठन् गच्छन् स्वपन् जाग्रत् यो- ध्यानं कुरुते नरः॥ पापकर्म विकुर्वाणो नहि मज्जति किल्विषे ॥ १५६ ॥

पंचमपटलः । ( १७१ )

टीका-जो मनुष्य बैठे चलते जाग्रतमें स्वप्नमें सर्वदा इस कमलका ध्यान करते हैं सो यदि पापकर्म रतभी हों तोभी मोक्षको प्राप्त होते हैं ॥ १५६ ॥ मूलम्-राजयोगाधिकारी स्यादेतच्चिन्तन- तो ध्रुवम्॥योगी बन्धाद्विनिर्मुक्तः स्वीयया प्रभया स्वयम् ॥१५७॥ द्विदलध्यानमा- हात्म्यं कथितुं नैव शक्यते ॥ ब्रह्मादिदे- वताश्चैव किञ्चिन्मत्तो विदन्ति ते ॥१५८॥ टीका-जो इस कमलका ध्यान करता है वह निश्चय राजयोगका अधिकारी है योगी स्वयं अपने प्रभासे सकलबन्धसे मुक्त होजाता है हे देवि ! इस द्विदलपद्मके माहात्म्यको कोई कहनेमें समर्थ नहीं है ब्रह्मा आदि देवता इस पद्मके माहात्म्यको किञ्चित् हमारे द्वारा जानते हैं ॥ १५७ ॥ १५८ ॥ मूलम्-अत ऊर्ध्वं तालुमूले सहस्रारं सरोरु- हम् ॥ अस्ति यत्र सुषुम्णाया मूलं सविव- रं स्थितम् ॥ १५९ ॥ टीका-इस आज्ञापद्मके ऊपर तालुमूलमें सहस्र- दल कमल शोभायमान है उसी स्थानमें ब्रह्मरन्ध्रके विवरमूलमें सुषुम्णा स्थित है ॥ १५९ ॥

(१७२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। मूलम्-तालुमूले सुषुम्णास्य अधोवक्त्रा प्रव- . र्तते ॥ मूलाधारेण योन्यस्ताः सर्वनाड्यः समाश्रिताः ॥ ता बीजभूतास्तत्त्वस्य ब्र- ह्ममार्गप्रदायिकाः ॥ १६० ॥ टीका-वह सुषुम्णाका मुख तालुमूल अर्थात् ब्र- ह्मारन्ध्रमें नीचेको वर्तमान है और मूलाधारसे योनि पर्यंत जो सकल नाडी हैं वह इस तत्त्वज्ञानबीजस्वरूप ब्रह्ममार्गकी दाता सुषुम्णाके अधोवदनके अवलम्बसे स्थित हैं ॥ १६० ॥ मूलम्-तालुस्थाने च यत्पद्मं सहस्रारं पुरो- दितम्॥तत्कन्दे योनिरैकास्ति पश्चिमा- भिमुखी मता॥ १६१॥ तस्य मध्ये सुषु- म्णाया मूलं सविवरं स्थितम् ॥ ब्रह्मरन्ध्रं तदेवोक्तमामूलाधारपङ्कजम् ॥ १६२ ॥ टीका-तालुस्थानमें जो सहस्रदल कमल कहाग- या है उसके कन्दमें एक योनि पश्चिमाभिमुखी है अर्थात् पीछेको मुख है उस योनिके मध्यमें जो मूलविवर है उसमें सुषुम्णा ज्ञाननाडी स्थित है हे देवी ! इसको ब्रह्मरन्ध्र और इसीको मूलाधारपद्मभी कहते हैं ॥ १६१ ॥ १६२ ॥ मूलम्-तत्रांतरन्ध्रे चिच्छक्तिः सुषुम्णा कु-

पंचमपटलः । ( १७३ ) ण्डली सदा ॥१६३॥ सुषुम्णायां स्थिता नाडी चित्रास्यान्मम वल्लभे ॥ तस्यां म- म मते कार्या ब्रह्मरन्ध्रादिकल्पना॥ १६४ ॥ टीका-यह सुषुम्णानाडीके रन्ध्रमें कुण्डलिनी शक्ति सर्वदा विराजमान है वह सुषुम्णा अन्तर्गत शक्ति को चित्रानाडी कहते हैं हे प्रिये पार्वति ! हमारे मतमें इसी चित्रासे ब्रह्मरन्ध्र आदि कल्पना भई है ॥१६३॥१६४॥ मूलम्-यस्याः स्मरणमात्रेण ब्रह्मज्ञत्वं प्र- जायते ॥ पापक्षयश्च भवति न भूयः पुरु- षो भवेत् ॥ १६५ ॥ टीका-यह चित्रानाडीके ध्यानमात्रसे ब्रह्मज्ञान उत्पन्न होता है और पाप क्षय होजाता है और फिर संसाररूपी बन्धमें योगी नहीं पडता अर्थात् मोक्ष होजाता है ॥ १६५ ॥ मूलम्-प्रवेशितं चलाङ्गुष्ठं मुखे स्वस्य निवे- शयेत् ॥ तेनात्र न वहत्येव देहचारी स- मीरणः ॥ १६६ ॥ टीका-दक्षिणहाथके अङ्गुष्ठको मुखमें प्रवेश कर- के मुखको बन्द करलेनेसे देहचारी जो प्राणवायु है वह निश्चय स्थिर होजाता है ॥ १६६ ॥

( १७४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-तेन संसारचक्रेस्मिन् भ्रमन्ते च स- र्वदा।।तदर्थं ये प्रवर्तन्ते योगिनः प्राणधार- णे॥१६७॥तत एवाखिला नाडी निरुद्धा चाष्टवेष्टनम्॥ इयं कुण्डलिनी शक्ती रन्ध्रं त्यजति नान्यथा ॥ १६८ ॥ टीका-यह प्राणवायुके स्थिर होजानेसे इस संसार चक्रमें सर्वदा भ्रमण करना छूटजाता है अर्थात् मोक्ष होजाता है इसहेतुसे योगी प्राणवायुके धारण करनेमें प्रवृत्त होते हैं और इसधारणसे सकलनाडी जो मल और काम क्रोधादि आठप्रकारसे बन्धनमें हैं वह खुल जाती हैं तब यह कुण्डलिनीशक्ति ब्रह्मरन्ध्रको निश्चय त्याग देती है इसके त्यागदेनेसे जीव ब्रह्मका सम्बन्ध होजाता है ॥ १६७ ॥ १६८ ॥ मूलम्-यदा पूर्णासु नाडीषु सन्निरुद्धानिला- स्तदा ॥ बन्धत्यागेन कुण्डल्या मुखं र- न्ध्राद्वहिर्भवेत् ॥ सुषुम्णायां सदैवायं व- हेत्प्राणसमीरणः ॥ १६९ ॥ टीका-जब वायु निरोध होके सकलनाडीमें पूर्ण होजायगा तब कुण्डलिनी अपने बन्धको त्याग- के ब्रह्मरन्ध्रके मुखको त्यागदेगी तब प्राणवायुका

पंचमपटल. । ( १७५ ) प्रवाह सदैव सुषुम्णामें होजायगा ॥ १६९ ॥ मूलम्-मूलपद्मस्थिता योनिर्वामदक्षिण- कोणतः॥इडा पिंगलयोर्मध्ये सुषुम्णा यो- निमध्यगा ॥ १७० ॥ ब्रह्मरन्ध्रन्तु तत्रैव सुषुम्णाधारमण्डले ॥ यो जानाति स मुक्तः स्यात्कर्मबन्धाद्विचक्षणः ॥१७१॥ टीका-मूलाधारपद्मस्थित जो योनि है उस योनिके वाम दक्षिण भागमें इडा और पिंगला नाडी स्थित हैं और दोनों नाडीके बीचमें अर्थात् योनिके मध्यमें सुषुम्णाकी स्थिति है उसी सुषुम्णाके आधारमंडलमें अर्थात् उसके मध्यमें ब्रह्मरन्ध्र है जो इसको जानता है सो बुद्धिमान् कर्मबन्धसे मुक्त है ॥ १७० ॥ १७१ ॥ मूलम्-ब्रह्मरन्ध्रमुखे तासां संगमः स्याद- संशयः॥ तस्मिन्स्नाने स्नातकानां मुक्तिः स्यादविरोधतः ॥ १७२ ॥ टीका-ब्रह्मरन्ध्रके मुखमें इन तीनों नाडीका नि- श्चय सम्बन्ध है इसमें स्नान करनेसे ज्ञानीलोगोंको मुक्तिलाभ होगी ॥ १७२ ॥ मूलम्-गंगायमुनयोर्मध्ये वहत्येषा सरस्व- ती ॥तासां तु संगमे स्नात्वा धन्यो याति परांगतिम् ॥ १७३ ॥

( १७६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका- गंगा यमुनाके मध्यमें सरस्वतीका प्रवाह है यह त्रिवेणीसंगममें स्नान करनेसे मनुष्य परमगतिको प्राप्त होता है ॥ १७३ ॥ मूलम्-इडा गंगा पुरा प्रोक्ता पिंगला चार्कपु- त्रिका ॥ मध्या सरस्वती प्रोक्ता तासां संगोऽतिदुर्लभः ॥ १७४ ॥ टीका-इडा गंगा है और पिंगला यमुना है और मध्यमें सुषुम्णा सरस्वती है यह त्रिवेणी संगम कहा गया है इसका स्नान अतिदुर्लभ है ॥ १७४ ॥ मूलम्-सितासिते संगमे यो मनसा स्ना- नमाचरेत् ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो याति ब्रह्मसनातनम् ॥ १७५ ॥ टीका-यह इडा और पिंगलाके संगममें मानसिक स्नान करनेसे साधक सर्व पापसे मुक्त होके सनातन ब्रह्ममें लय होजाताहै ॥ १७५ ॥ मूलम्-त्रिवेण्यां संगमे यो वै पितृकर्म स- माचरेत् ॥ तारयित्वा पितृन्सर्वान्स याति परमां गतिम् ॥ १७६ ॥ टीका-जो पुरुष इस त्रिवेणीसंगममें पितृकर्मका