शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
पृष्ठ 178, कुल 216 में से
संदर्भ में पढ़ें( १७४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-तेन संसारचक्रेस्मिन् भ्रमन्ते च स- र्वदा।।तदर्थं ये प्रवर्तन्ते योगिनः प्राणधार- णे॥१६७॥तत एवाखिला नाडी निरुद्धा चाष्टवेष्टनम्॥ इयं कुण्डलिनी शक्ती रन्ध्रं त्यजति नान्यथा ॥ १६८ ॥ टीका-यह प्राणवायुके स्थिर होजानेसे इस संसार चक्रमें सर्वदा भ्रमण करना छूटजाता है अर्थात् मोक्ष होजाता है इसहेतुसे योगी प्राणवायुके धारण करनेमें प्रवृत्त होते हैं और इसधारणसे सकलनाडी जो मल और काम क्रोधादि आठप्रकारसे बन्धनमें हैं वह खुल जाती हैं तब यह कुण्डलिनीशक्ति ब्रह्मरन्ध्रको निश्चय त्याग देती है इसके त्यागदेनेसे जीव ब्रह्मका सम्बन्ध होजाता है ॥ १६७ ॥ १६८ ॥ मूलम्-यदा पूर्णासु नाडीषु सन्निरुद्धानिला- स्तदा ॥ बन्धत्यागेन कुण्डल्या मुखं र- न्ध्राद्वहिर्भवेत् ॥ सुषुम्णायां सदैवायं व- हेत्प्राणसमीरणः ॥ १६९ ॥ टीका-जब वायु निरोध होके सकलनाडीमें पूर्ण होजायगा तब कुण्डलिनी अपने बन्धको त्याग- के ब्रह्मरन्ध्रके मुखको त्यागदेगी तब प्राणवायुका