शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचमपटलः । ( १७३ ) ण्डली सदा ॥१६३॥ सुषुम्णायां स्थिता नाडी चित्रास्यान्मम वल्लभे ॥ तस्यां म- म मते कार्या ब्रह्मरन्ध्रादिकल्पना॥ १६४ ॥ टीका-यह सुषुम्णानाडीके रन्ध्रमें कुण्डलिनी शक्ति सर्वदा विराजमान है वह सुषुम्णा अन्तर्गत शक्ति को चित्रानाडी कहते हैं हे प्रिये पार्वति ! हमारे मतमें इसी चित्रासे ब्रह्मरन्ध्र आदि कल्पना भई है ॥१६३॥१६४॥ मूलम्-यस्याः स्मरणमात्रेण ब्रह्मज्ञत्वं प्र- जायते ॥ पापक्षयश्च भवति न भूयः पुरु- षो भवेत् ॥ १६५ ॥ टीका-यह चित्रानाडीके ध्यानमात्रसे ब्रह्मज्ञान उत्पन्न होता है और पाप क्षय होजाता है और फिर संसाररूपी बन्धमें योगी नहीं पडता अर्थात् मोक्ष होजाता है ॥ १६५ ॥ मूलम्-प्रवेशितं चलाङ्गुष्ठं मुखे स्वस्य निवे- शयेत् ॥ तेनात्र न वहत्येव देहचारी स- मीरणः ॥ १६६ ॥ टीका-दक्षिणहाथके अङ्गुष्ठको मुखमें प्रवेश कर- के मुखको बन्द करलेनेसे देहचारी जो प्राणवायु है वह निश्चय स्थिर होजाता है ॥ १६६ ॥