भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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( १६८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-आज्ञापद्ममिदं प्रोक्तं यत्र देवो महे- श्वरः ॥ १४६ ॥ पीठत्रयं ततश्चोर्ध्वं निरु- क्तं योगचिन्तकैः ॥ तद्विन्दुनादशक्त्या- ख्यं भालपद्मे व्यवस्थितम् ॥ १४७ ॥ टीका-इस स्थानमें महेश्वर देवताहै इसको आज्ञापद्म कहते हैं और योगचिन्तक लोग कहते हैं कि, इस पद्मके ऊपर पीठत्रयकी स्थिति है अर्थात् नाद, बिंदु, शक्ति, यह तीनों इस भालपद्ममें विराज- मान हैं ॥ १४६ ॥ १४७ ॥ मूलम्-यः करोति सदा ध्यानमाज्ञापद्मस्य गोपितम् ॥ पूर्वजन्मकृतं कर्म विनश्येद- विरोधतः ॥ १४८ ॥ ॥ टीका-जो पुरुष सर्वदा गोपित करके इस आज्ञा- कमलका ध्यान करते हैं उनका पूर्वजन्मकृत कर्मफल सकल निर्विघ्न नाश होजाताहै ॥ १४८ ॥ मूलम्-इह स्थितः सदा योगी ध्यानं कुर्या- न्निरन्तरम् ॥ तदा करोति प्रतिमां प्रति- जापमनर्थवत् ॥ १४९॥ टीका-जब योगी यह ध्यान सर्वदा निरन्तर करे