शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचमपटलः । ( १७१ )
टीका-जो मनुष्य बैठे चलते जाग्रतमें स्वप्नमें सर्वदा इस कमलका ध्यान करते हैं सो यदि पापकर्म रतभी हों तोभी मोक्षको प्राप्त होते हैं ॥ १५६ ॥ मूलम्-राजयोगाधिकारी स्यादेतच्चिन्तन- तो ध्रुवम्॥योगी बन्धाद्विनिर्मुक्तः स्वीयया प्रभया स्वयम् ॥१५७॥ द्विदलध्यानमा- हात्म्यं कथितुं नैव शक्यते ॥ ब्रह्मादिदे- वताश्चैव किञ्चिन्मत्तो विदन्ति ते ॥१५८॥ टीका-जो इस कमलका ध्यान करता है वह निश्चय राजयोगका अधिकारी है योगी स्वयं अपने प्रभासे सकलबन्धसे मुक्त होजाता है हे देवि ! इस द्विदलपद्मके माहात्म्यको कोई कहनेमें समर्थ नहीं है ब्रह्मा आदि देवता इस पद्मके माहात्म्यको किञ्चित् हमारे द्वारा जानते हैं ॥ १५७ ॥ १५८ ॥ मूलम्-अत ऊर्ध्वं तालुमूले सहस्रारं सरोरु- हम् ॥ अस्ति यत्र सुषुम्णाया मूलं सविव- रं स्थितम् ॥ १५९ ॥ टीका-इस आज्ञापद्मके ऊपर तालुमूलमें सहस्र- दल कमल शोभायमान है उसी स्थानमें ब्रह्मरन्ध्रके विवरमूलमें सुषुम्णा स्थित है ॥ १५९ ॥