शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
पंचमपटलः । ( १७१ )
टीका-जो मनुष्य बैठे चलते जाग्रतमें स्वप्नमें सर्वदा इस कमलका ध्यान करते हैं सो यदि पापकर्म रतभी हों तोभी मोक्षको प्राप्त होते हैं ॥ १५६ ॥ मूलम्-राजयोगाधिकारी स्यादेतच्चिन्तन- तो ध्रुवम्॥योगी बन्धाद्विनिर्मुक्तः स्वीयया प्रभया स्वयम् ॥१५७॥ द्विदलध्यानमा- हात्म्यं कथितुं नैव शक्यते ॥ ब्रह्मादिदे- वताश्चैव किञ्चिन्मत्तो विदन्ति ते ॥१५८॥ टीका-जो इस कमलका ध्यान करता है वह निश्चय राजयोगका अधिकारी है योगी स्वयं अपने प्रभासे सकलबन्धसे मुक्त होजाता है हे देवि ! इस द्विदलपद्मके माहात्म्यको कोई कहनेमें समर्थ नहीं है ब्रह्मा आदि देवता इस पद्मके माहात्म्यको किञ्चित् हमारे द्वारा जानते हैं ॥ १५७ ॥ १५८ ॥ मूलम्-अत ऊर्ध्वं तालुमूले सहस्रारं सरोरु- हम् ॥ अस्ति यत्र सुषुम्णाया मूलं सविव- रं स्थितम् ॥ १५९ ॥ टीका-इस आज्ञापद्मके ऊपर तालुमूलमें सहस्र- दल कमल शोभायमान है उसी स्थानमें ब्रह्मरन्ध्रके विवरमूलमें सुषुम्णा स्थित है ॥ १५९ ॥
(१७२) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। मूलम्-तालुमूले सुषुम्णास्य अधोवक्त्रा प्रव- . र्तते ॥ मूलाधारेण योन्यस्ताः सर्वनाड्यः समाश्रिताः ॥ ता बीजभूतास्तत्त्वस्य ब्र- ह्ममार्गप्रदायिकाः ॥ १६० ॥ टीका-वह सुषुम्णाका मुख तालुमूल अर्थात् ब्र- ह्मारन्ध्रमें नीचेको वर्तमान है और मूलाधारसे योनि पर्यंत जो सकल नाडी हैं वह इस तत्त्वज्ञानबीजस्वरूप ब्रह्ममार्गकी दाता सुषुम्णाके अधोवदनके अवलम्बसे स्थित हैं ॥ १६० ॥ मूलम्-तालुस्थाने च यत्पद्मं सहस्रारं पुरो- दितम्॥तत्कन्दे योनिरैकास्ति पश्चिमा- भिमुखी मता॥ १६१॥ तस्य मध्ये सुषु- म्णाया मूलं सविवरं स्थितम् ॥ ब्रह्मरन्ध्रं तदेवोक्तमामूलाधारपङ्कजम् ॥ १६२ ॥ टीका-तालुस्थानमें जो सहस्रदल कमल कहाग- या है उसके कन्दमें एक योनि पश्चिमाभिमुखी है अर्थात् पीछेको मुख है उस योनिके मध्यमें जो मूलविवर है उसमें सुषुम्णा ज्ञाननाडी स्थित है हे देवी ! इसको ब्रह्मरन्ध्र और इसीको मूलाधारपद्मभी कहते हैं ॥ १६१ ॥ १६२ ॥ मूलम्-तत्रांतरन्ध्रे चिच्छक्तिः सुषुम्णा कु-
पंचमपटलः । ( १७३ ) ण्डली सदा ॥१६३॥ सुषुम्णायां स्थिता नाडी चित्रास्यान्मम वल्लभे ॥ तस्यां म- म मते कार्या ब्रह्मरन्ध्रादिकल्पना॥ १६४ ॥ टीका-यह सुषुम्णानाडीके रन्ध्रमें कुण्डलिनी शक्ति सर्वदा विराजमान है वह सुषुम्णा अन्तर्गत शक्ति को चित्रानाडी कहते हैं हे प्रिये पार्वति ! हमारे मतमें इसी चित्रासे ब्रह्मरन्ध्र आदि कल्पना भई है ॥१६३॥१६४॥ मूलम्-यस्याः स्मरणमात्रेण ब्रह्मज्ञत्वं प्र- जायते ॥ पापक्षयश्च भवति न भूयः पुरु- षो भवेत् ॥ १६५ ॥ टीका-यह चित्रानाडीके ध्यानमात्रसे ब्रह्मज्ञान उत्पन्न होता है और पाप क्षय होजाता है और फिर संसाररूपी बन्धमें योगी नहीं पडता अर्थात् मोक्ष होजाता है ॥ १६५ ॥ मूलम्-प्रवेशितं चलाङ्गुष्ठं मुखे स्वस्य निवे- शयेत् ॥ तेनात्र न वहत्येव देहचारी स- मीरणः ॥ १६६ ॥ टीका-दक्षिणहाथके अङ्गुष्ठको मुखमें प्रवेश कर- के मुखको बन्द करलेनेसे देहचारी जो प्राणवायु है वह निश्चय स्थिर होजाता है ॥ १६६ ॥
( १७४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-तेन संसारचक्रेस्मिन् भ्रमन्ते च स- र्वदा।।तदर्थं ये प्रवर्तन्ते योगिनः प्राणधार- णे॥१६७॥तत एवाखिला नाडी निरुद्धा चाष्टवेष्टनम्॥ इयं कुण्डलिनी शक्ती रन्ध्रं त्यजति नान्यथा ॥ १६८ ॥ टीका-यह प्राणवायुके स्थिर होजानेसे इस संसार चक्रमें सर्वदा भ्रमण करना छूटजाता है अर्थात् मोक्ष होजाता है इसहेतुसे योगी प्राणवायुके धारण करनेमें प्रवृत्त होते हैं और इसधारणसे सकलनाडी जो मल और काम क्रोधादि आठप्रकारसे बन्धनमें हैं वह खुल जाती हैं तब यह कुण्डलिनीशक्ति ब्रह्मरन्ध्रको निश्चय त्याग देती है इसके त्यागदेनेसे जीव ब्रह्मका सम्बन्ध होजाता है ॥ १६७ ॥ १६८ ॥ मूलम्-यदा पूर्णासु नाडीषु सन्निरुद्धानिला- स्तदा ॥ बन्धत्यागेन कुण्डल्या मुखं र- न्ध्राद्वहिर्भवेत् ॥ सुषुम्णायां सदैवायं व- हेत्प्राणसमीरणः ॥ १६९ ॥ टीका-जब वायु निरोध होके सकलनाडीमें पूर्ण होजायगा तब कुण्डलिनी अपने बन्धको त्याग- के ब्रह्मरन्ध्रके मुखको त्यागदेगी तब प्राणवायुका
पंचमपटल. । ( १७५ ) प्रवाह सदैव सुषुम्णामें होजायगा ॥ १६९ ॥ मूलम्-मूलपद्मस्थिता योनिर्वामदक्षिण- कोणतः॥इडा पिंगलयोर्मध्ये सुषुम्णा यो- निमध्यगा ॥ १७० ॥ ब्रह्मरन्ध्रन्तु तत्रैव सुषुम्णाधारमण्डले ॥ यो जानाति स मुक्तः स्यात्कर्मबन्धाद्विचक्षणः ॥१७१॥ टीका-मूलाधारपद्मस्थित जो योनि है उस योनिके वाम दक्षिण भागमें इडा और पिंगला नाडी स्थित हैं और दोनों नाडीके बीचमें अर्थात् योनिके मध्यमें सुषुम्णाकी स्थिति है उसी सुषुम्णाके आधारमंडलमें अर्थात् उसके मध्यमें ब्रह्मरन्ध्र है जो इसको जानता है सो बुद्धिमान् कर्मबन्धसे मुक्त है ॥ १७० ॥ १७१ ॥ मूलम्-ब्रह्मरन्ध्रमुखे तासां संगमः स्याद- संशयः॥ तस्मिन्स्नाने स्नातकानां मुक्तिः स्यादविरोधतः ॥ १७२ ॥ टीका-ब्रह्मरन्ध्रके मुखमें इन तीनों नाडीका नि- श्चय सम्बन्ध है इसमें स्नान करनेसे ज्ञानीलोगोंको मुक्तिलाभ होगी ॥ १७२ ॥ मूलम्-गंगायमुनयोर्मध्ये वहत्येषा सरस्व- ती ॥तासां तु संगमे स्नात्वा धन्यो याति परांगतिम् ॥ १७३ ॥
( १७६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका- गंगा यमुनाके मध्यमें सरस्वतीका प्रवाह है यह त्रिवेणीसंगममें स्नान करनेसे मनुष्य परमगतिको प्राप्त होता है ॥ १७३ ॥ मूलम्-इडा गंगा पुरा प्रोक्ता पिंगला चार्कपु- त्रिका ॥ मध्या सरस्वती प्रोक्ता तासां संगोऽतिदुर्लभः ॥ १७४ ॥ टीका-इडा गंगा है और पिंगला यमुना है और मध्यमें सुषुम्णा सरस्वती है यह त्रिवेणी संगम कहा गया है इसका स्नान अतिदुर्लभ है ॥ १७४ ॥ मूलम्-सितासिते संगमे यो मनसा स्ना- नमाचरेत् ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो याति ब्रह्मसनातनम् ॥ १७५ ॥ टीका-यह इडा और पिंगलाके संगममें मानसिक स्नान करनेसे साधक सर्व पापसे मुक्त होके सनातन ब्रह्ममें लय होजाताहै ॥ १७५ ॥ मूलम्-त्रिवेण्यां संगमे यो वै पितृकर्म स- माचरेत् ॥ तारयित्वा पितृन्सर्वान्स याति परमां गतिम् ॥ १७६ ॥ टीका-जो पुरुष इस त्रिवेणीसंगममें पितृकर्मका
५. पञ्चम पटल: चक्र-भेदन, राजयोग, नाद-साधन व मुक्ति
पंचमपटलः । ( १७७ ) अनुष्ठान करते हैं वह सर्व पितृकुलको तारके परम गतिको लाभ करते हैं ॥ १७६ ॥ मूलम्-नित्यं नैमित्तिकं काम्यं प्रत्यहं यः समाचरेत्॥ मनसा चिन्तयित्वा तु सोऽक्ष- यं फलमाप्नुयात् ॥ १७७ ॥ टीका-उसी संगमस्थानमें जो साधक नित्य और नै- मित्तक और काम्य कर्मका अनुष्ठान सर्वदा मनसे चिन्त- नपूर्वक करते हैं सो अक्षय फललाभ करते हैं ॥ १७७ ॥ मूलम्-सकृद्यः कुरुते स्नानं स्वर्गे सौख्यं भु- नक्ति सः ॥ दग्ध्वा पापानशेषान्वै योगी शुद्धमतिः स्वयम्॥ १७८॥ अपवित्रः पवि- त्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा ॥ स्नानाचर- णमात्रेण पूतो भवति नान्यथा ॥ १७९ ॥ टीका-जो पवित्रमति योगी एकवार इस संगममें स्नान करते हैं वह सर्व पापको दग्धकरके स्वर्गका दिव्य भोग भोगते हैं और यह साधक पवित्र हो वा अपवित्र हो वा किसी अवस्थामें हो यह संगमके ध्यानरूपी स्नानमात्रसे निश्चय पवित्र होजायगा ॥ १७८॥ १७९॥ मूलम्-मृत्युकाले प्लुतं देहं त्रिवेण्याः सलि-
( १७८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । ले यदा ॥ विचिन्त्य यस्त्यजेत्प्राणान्स तदा मोक्षमवाप्नुयात् ॥ १८० ॥ टीका-मृत्युके समयमें साधक जो यह चिंतन करे कि हमारा शरीर त्रिवेणीके सलिलमें मग्न है तो उसी क्षण प्राणको त्यागके मोक्षगतिको प्राप्त होगा ॥१८०॥ मूलम्-नातः परतरं गुह्यं त्रिषु लोकेषु विद्य- ते ॥ गोप्तव्यं तत्प्रयत्नेन न व्याख्येयं कदाचन ॥ १८१ ॥ टीका-इस तीर्थसे परे त्रिभुवनमें दूसरा गुप्त तीर्थ नहीं है इसको यत्नसे गोपित रखना उचित है यह कदा- पि प्रकाश करनेके योग्य नहीं है ॥ १८१ ॥ मूलम्-ब्रह्मरन्ध्रे मनो दत्त्वा क्षणार्धं यदि तिष्ठति ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम् ॥ १८२ ॥ टीका-ब्रह्मरन्ध्रमें मन देकरके यदि क्षणार्धभी स्थिर रक्खे तो सर्वपापसे मुक्त होके साधक परमगतिको अर्थात् मोक्षको प्राप्त होजाय ॥ १८२ ॥ मूलम्-अस्मिन् लीनं मनो यस्य स योगी मयि लीयते॥ अणिमादिगुणान्भुक्त्वा स्वे- च्छया पुरुषोत्तमः ॥ १८३ ॥
पंचमपटलः। ( १७९ ) टीका-हे पार्वती ! इस ब्रह्मरन्ध्रमें जिसका मन लीन होंय सो पुरुषोत्तम योगी अणिमादिगुणोंको भोगके इच्छापूर्वक हमारेमें लय होजायगा ॥ १८३ ॥ मूलम्-एतद्रन्ध्रध्यानमात्रेण मर्त्यः संसारे स्मिन्वल्लभो मे भवेत्सः ॥ पापान् जि- त्वा मुक्तिमार्गाधिकारी ज्ञानं दत्त्वा तार- यत्यद्भुतं वै ॥ १८४ ॥ टीका-हे देवी ! इस ब्रह्मरन्ध्रके ध्यानमात्रसे यह सं- सारमें प्राणी हमको प्रिय होजाता है और पापराशिको जीतके यह साधक मुक्तिमार्गका अधिकारी होजाता है और अनेक मनुष्योंको ज्ञान उपदेश करके संसार- से परित्राण करदेता है ॥ १८४ ॥ मूलम्-चतुर्मुखादित्रिदशैरगम्यं योगिवल्ल- भम् ॥ प्रयत्नेन सुगोप्यं तद्ब्रह्मरन्ध्रं म- योदितम् ॥ १८५ ॥ टीका-हे देवी ! यह ब्रह्मरन्ध्रका ध्यान जो हमने कहा है इसको यत्न करके गोपित रखना उचित है यह ज्ञान योगीलोगोंको अतिप्रिय है इसका मार्ग ब्रह्मा आदि देवताओंकोभी अगम्य.हैं ॥ १८५ ॥ मूलम्-पुरा मयोक्ता या योनिः सहस्रारे स-
( १८० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । रोरुहे ॥ तस्याऽधो वर्तते चन्द्रस्तद्ध्यानं क्रियते बुधैः ॥ १८४ ॥ टीका-हे देवि ! पहिले जो सहस्रदलकमलके मध्यमें योनिमण्डल हमने कहा है उस योनिके अधोभागमें चन्द्रमा स्थित है यह चन्द्रमण्डलका बुद्धिमान् लोग सर्वदा ध्यान करते हैं ॥ १८४ ॥ मूलम्-यस्य स्मरणमात्रेण योगीन्द्रोऽव- निमण्डले॥पूज्यो भवति देवानां सिद्धानां सम्मतो भवेत् ॥ १८७ ॥ टीका-इस चन्द्रमंडलके ध्यानमात्रसे योगीन्द्र संसारमें पूजनीय होजाता है और देवता और सिद्ध- लोगोंके तुल्य होजाता है ॥ १८७ ॥ मूलम्-शिरःकपालविवरे ध्यायेद्दुग्धमहो- दधिम् ॥ तत्र स्थित्वा सहस्रारे पद्मे चन्द्रं विचिन्तयेत् ॥ १८८ ॥ टीका-शिरस्थित जो कपालविवर है उसमें क्षीर समुद्रका ध्यान करे उसी स्थानमें स्थितिपूर्वक सहस्र- दलकमलमें चन्द्रमाका चिन्तन करे ॥ १८८ ॥ मूलम्-शिरःकपालविवरे द्विरष्टकलयायु- तः ॥ पीयूषभानुहंसाख्यं भावयेत्तं निरं-
पंचमपटलः ( १८१ ) जनम् ॥ १८९ ॥ निरन्तरकृताभ्यासात्त्रि- दिने पश्यति ध्रुवम्॥ दृष्टिमात्रेण पापौघं दहत्येव स साधकः ॥ १९० ॥ टीका—वह शिरःस्थित कपालविवरमें सोलह कलासं- युक्त अमृतकिरणसे युक्त हंससंज्ञक निरंजनका चिन्तन करे निरन्तर तीन दिन यह अभ्यास करनेसे निरञ्जनका साक्षात् साधकको अवश्य प्रकाश होगा सो साधकदृष्टिमा- त्रेसे सर्व पातकोंको दहन करडालेगा ॥ १८९ ॥१९०॥ मूलम्--अनागतञ्च स्फुरति चित्तशुद्धिर्भवे- त्खलु ॥ सद्यः कृत्वापि दहति महापात- कपञ्चकम् ॥ १९१ ॥ टीका—यह ध्यान करनेसे अनागतविषयकी स्फू- र्ति होगी अर्थात् जो विषय कभी उत्पन्न नहीं भया है उसकी स्फूर्ति होगी और चित्तकी शुद्धि होगी और सा- धक ध्यानमात्रसे उसी क्षण पञ्चमहापातक दहन कर- डालेगा ॥ १९१ ॥ मूलम्--आनुकूल्यं ग्रहा यान्ति सर्वे नश्य- न्त्युपद्रवाः ॥ उपसर्गाः शमं यान्ति युद्धे जयमवाप्नुयात् ॥ १९२ ॥ खेचरीभूचरी- सिद्धिर्भवेत्क्षीरेन्दुदर्शनात् ॥ ध्यानादेव
( १८२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । भवेत्सर्वं नात्र कार्या विचारणा ॥ १९३ ॥ सन्तताभ्यासयोगेन सिद्धो भवति मा- नवः॥ सत्यं सत्यं पुनः सत्यं मम तुल्यो भवेद्ध्रुवम् ॥ योगशास्त्रं च परमं योगिनां सिद्धिदायकम् ॥ १९४ ॥ टीका-शिरःस्थचन्द्रमाका ध्यान करनेसे सर्व ग्रह अनुकूल होजाते हैं और समस्त उपद्रवका नाश होजा- ताहै और उपसर्ग प्रशमित होते हैं और युद्धमें जय लाभ होता है और खेचरी भूचरीकी सिद्धि प्राप्त होती है इसमें सन्देह नहीं है और निरन्तर यह योगाभ्यास करनेसे अवश्य साधक सिद्ध होजाता है हे पार्वती ! हम सत्य सत्य वारंवार कहते हैं कि हमारे तुल्य होजाय- गा इसमें सन्देह नहीं है यह परमयोग योगीलोगोंके सिद्धिका दाता है ॥ १९२ ॥ १९३ ॥ १९४ ॥ अथ राजयोगकथनम् । मूलम्-अत ऊर्ध्वं दिव्यरूपं सहस्रारं सरोरु- हम् ॥ ब्रह्माण्डाख्यस्य देहस्य बाह्ये तिष्ठति मुक्तिदम् ॥१९५ ॥ कैलासो नाम तस्यैव महेशो यत्र तिष्ठति॥अकुलाख्योऽ- विनाशी च क्षयवृद्धिविवर्जितः ॥ १९६ ॥
पंचमपटलः । ( १८३ ) टीका-तालुके ऊपरभागमें दिव्य सहस्रदल कमल है यह कमल मुक्तिदाता ब्रह्माण्डरूपी शरीरके बाहर स्थित है अर्थात् शरीरके ऊपर अंतमें है इसी कमल- को कैलास कहते हैं इसी स्थानमें महेश्वरकी स्थिति है यह ईश्वर निराकुल अविनाशी और क्षयवृद्धिरहित है ॥ १९५ ॥ १९६ ॥ मूलम्-स्थानस्यास्य ज्ञानमात्रेण नृणां सं- सारेऽस्मिन्सम्भवो नैव भूयः ॥ भूतग्रा- मं सन्तताभ्यासयोगात्कर्तुं हर्तुं स्याच्च शक्तिः समग्रा ॥ १९७ ॥ टीका-इस स्थानके ज्ञानमात्रसे जीवका यह सं- सारमें फिर जन्म नहीं होता और सर्वदा यह ज्ञानयोग अभ्यास करनेसे जीवमात्रके स्थिति संहार करनेकी शक्ति उत्पन्न होती है ॥ १९७ ॥ मूलम्-स्थाने परे हंसनिवासभूते कैलासना- म्नीह निविष्टचेताः॥ योगी हतव्याधिरधः कृताधिर्वायुश्चिरं जीवति मृत्युमुक्तः१९८॥ टीका-यह कैलासनामक स्थानमें परमहंसका निवास है सो सहस्रदलकमलमें जो साधक मनको स्थिर करता है उसकी सकल व्याधि नाश होजाती है और मृत्युसे छूटके अमर होजाताहै ॥ १९८ ॥
( १८४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। मूलम्-चित्तवृत्तिर्यदा लीना कुलाख्ये पर- मेश्वरे॥तदा समाधिसाम्येन योगी निश्च- लतां व्रजेत् ॥१९९ ॥ टीका-जब साधक यह कुलनामक ईश्वरमें चित्त- को लीन करदेगा तब योगीकी समाधि निश्चल सम होजायगी ॥ १९९ ॥ मूलम्-निरन्तरकृते ध्याने जगद्विस्मरणं भवेत् ॥ तदा विचित्रसामर्थ्यं योगिनो भवति ध्रुवम् ॥ २०० ॥ टीका-यह निरन्तर ध्यान करनेसे जगत् विस्मरण होजायगा तब योगीको अवश्य विचित्र सामर्थ्य हो- जायगी ॥ २०० ॥ मूलम्-तस्माद्गलितपीयूषं पिबेद्योगी निर- न्तरम्॥ मृत्योर्मृत्युं विधायाशु कुलं जि- त्वा सरोरुहे ॥ २०१ ॥ अत्र कुण्डलिनी शक्तिर्लयं याति कुलाभिधा ॥ तदा चतु- र्विधा सृष्टिर्लीयते परमात्मनि ॥ २०२ ॥ टीका-सहस्रदलकमलसे जो अमृत स्रवता है उ- सको योगी निरन्तर पान करता है सो योगी अपने मृ- त्युका मृत्युविधानपूर्वक कुलसहित जय करके चिरं-
पंचमपटलः । ( १८५) जीवी होजाता है और यही सहस्रदलकमलमें कुटरूपा कुण्डलिनी शक्तिका लय होजाता है तब यह चतुर्विध सृष्टिभी परमात्मामें लय होजाती है ॥ २०१ ॥ २०२ ॥ मूलम्-यज्ज्ञात्वा प्राप्य विषयं चित्तवृत्ति- र्विलीयते ॥ तस्मिन्परिश्रमं योगी करो- ति निरपेक्षतः ॥ २०३ ॥ टीका-यह सहस्रदलकमलके ज्ञान होनेसे अर्थात् इस विषयको प्राप्त करनेसे चित्तवृत्तिका लय होजाता है इस हेतुसे इसके ज्ञानार्थ निरपेक्षरूपसे योगी परिश्र- म करे ॥ २०३ ॥ मूलम्-चित्तवृत्तिर्यदा लीना तस्मिन्योगी भवेद्ध्रुवम्॥ तदा विज्ञायतेऽखण्डज्ञानरूपो निरञ्जनः ॥ २०४ ॥ टीका-जब योगीकी चित्तवृत्ति इसमें निश्चय लय होजायगी तब अखण्ड ज्ञानरूपी निरञ्जनका प्रकाश होगा अर्थात् ज्ञान होगा ॥ २०४ ॥ मूलम्-ब्रह्मांडबाह्ये संचिंत्य स्वप्रतीकं य- थोदितम् ॥ तमावेश्य महच्छून्यं चिन्त- येदविरोधतः॥ २०५॥ टीका-ब्रह्माण्डके बाहर अर्थात् ब्रह्मांडरूप शरीरके
( १८६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । बाहर पूर्वोक्त स्वप्रतीकका चिन्तन करे उससे चित्तको स्थिर करके महत् शून्यका शुद्धवृत्तिसे चिन्तन करे २०५ मूलम्-आद्यन्तमध्यशून्यं तत्कोटिसूर्यस- मप्रभम् ॥ चन्द्रकोटिप्रतीकाशमभ्यस्य सिद्धिमाप्नुयात् ॥ २०६ ॥ टीका-आदि अंत मध्य शून्य यह सर्वत्र शून्यमें कोटि सूर्यके समान प्रभा और कोटिचन्द्रके समान शीतलप्रकाशके देखनेका अभ्यास करनेसे साधकको परमसिद्धि लाभ होगी ॥ २०६ ॥ मूलम्-एतद्ध्यानं सदा कुर्यादनालस्यं दिने दिने ॥ तस्य स्यात्सकला सिद्धिर्व- त्सरान्नात्र संशयः ॥ २०७ ॥ टीका-जो पुरुष आलस्यको त्यागके सर्वदा प्रति- दिन इस शून्यका ध्यान करेगा उसको निश्चय एकवर्ष में सकल सिद्धि लाभ होगी ॥२०७ ॥ मूलम्-क्षणार्धं निश्चलं तत्र मनो यस्य भ- वेद्ध्रुवम्॥स एव योगी सद्भक्तः सर्वलोकेषु पूजितः ॥ तस्य कल्मषसङ्घातस्तत्क्षणा- देव नश्यति ॥ २०८ ॥ टीका-जो साधक इस शून्यमें अर्धक्षणभी मनको
पंचमपटलः। ( १८७ ) निश्चल स्थिर रक्खेगा वही निश्चय यथार्थ भक्त योगी है और वह सर्वलोकमें पूजित होता है और उसके पाप- का समूह उसी क्षण नष्ट होजाता है ॥ २०८ ॥ मूलम्-यं दृष्ट्वा न प्रवर्तन्ते मृत्युसंसारव- र्त्मनि॥अभ्यसेत्तं प्रयत्नेन स्वाधिष्ठानेन वर्त्मना ॥ २०९ ॥ टीका-इसके अवलोकन करनेसे मृत्युरूप जो सं- सारपथ है इसमें भ्रमण करना छूट जायगा अर्थात् जन्ममरणसे रहित होजायगा इसका अभ्यास स्वाधि- ष्ठानमार्गसे यत्न करके करना उचित है ॥ २०९ ॥ मूलम्-एतद्ध्यानस्य माहात्म्यं मया वक्तुं न शक्यते ॥ यः साधयति जानाति सोस्माकमपि सम्मतः ॥ २१० ॥ टीका-हे देवी ! इस शून्यके ध्यानके माहात्म्यको हम नहीं कहसकते अर्थात् बहुत विशेष है जो योगी इसका अभ्यास करते हैं सो जानते हैं और वह हमारे बराबर हैं ॥ २१० ॥ मूलम्-ध्यानादेव विजानाति विचित्रफल- सम्भवम् ॥ अणिमादिगुणोपेतो भवत्ये- व न संशयः ॥ २११ ॥
(१८८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। टीका-यह शून्यके ध्यानका विचित्र फल ध्यानसे ही जाना जाता है इसके प्रभावसे साधकको अणिमादि अष्टसिद्धि अवश्य प्राप्त होती है ॥ २११ ॥ मूलम्-राजयोगो मयाख्यातः सर्वतन्त्रेषु गोपितः॥राजाधिराजयोगोऽयं कथया- मि समासतः ॥ २१२ ॥ टीका-हे पार्वती ! यह राजयोग सर्वतन्त्रोंकरके गोपित है सो तुमसे हमने कहा है अब राजाधिराज यो- ग विस्तारसहित कहते हैं श्रवण करो ॥ २१२ ॥ मूलम्-स्वस्तिकञ्चासनं कृत्वा सुमठे जन्तु- वर्जिते ॥ गुरुं संपूज्य यत्नेन ध्यानमेत- त्समाचरेत् ॥ २१३ ॥ टीका-साधक एकांतस्थान जनरहित सुन्दर मठमें यत्नपूर्वक गुरुकी पूजा करके स्वस्तिकासनसे स्थित होके यह ध्यान करे ॥ २१३ ॥ मूलम्-निरालम्बं भवेज्जीवं ज्ञात्वा वेदान्त- युक्तितः॥निरालम्बं मनः कृत्वा न किञ्चि- च्चिन्तयेत्सुधीः ॥ २१४ ॥ टीका-बुद्धिमान् योगी वेदांतयुक्ति अनुसार जीव- को और मनको निरालम्ब करके चिन्तन करे इसके सिवाय और कुछ चिन्तना न करे ॥ २१४ ॥
पंचमपटलः । ( १८९ ) मूलम्-एतद्ध्यानान्महासिद्धिर्भवत्येव न संशयः ॥ वृत्तिहीनं मनः कृत्वा पूर्णरूपं स्वयं भवेत् ॥ २१५ ॥ टीका-इसप्रकार ध्यान करनेसे महासिद्धि उत्पन्न होगी इसमें संशय नहीं है ऐसेही मनको वृत्तिहीन करके साधक आपही पूर्ण आत्मस्वरूप होजायगा ॥ २१५ ॥ मूलम्-साधयेत्सततं यो वै सयोगी विगत- स्पृहः ॥ अहंनाम न कोप्यस्ति सर्वदा- त्मैव विद्यते ॥ २१६ ॥ टीका-जो योगी निरन्तर इसप्रकार साधन करे सो इच्छारहित है अर्थात् उसको किसी वस्तुकी इच्छा न होगी और उसके वदनसे अहंशब्द कभी उच्चारण न होगी वह सर्वदा सर्ववस्तुको आत्मस्वरूपही देखेगा ॥ २१६ ॥ मूलम्-को बन्धः कस्य वा मोक्ष एकं पश्ये- त्सदा हि सः ॥ २१७ ॥ एतत्करोति यो नित्यं स मुक्तो नात्र संशयः॥ स एव योगी सद्भक्तः सर्वलोकेषु पूजितः ॥ २१८ ॥ टीका-कौन बन्ध है और क्या मोक्ष है सर्वदा एक परिपूर्ण आत्माको देखे जो योगी यह नित्य चिन्तन क-
( १९० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेत । रता है सो मुक्त है इसमें संशय नहीं है और निश्चय वही योगी सद्भक्त है और सर्वलोकमें पूजनीय है २१७॥२१८॥ मूलम्-अहमस्मीति यन्मत्वा जीवात्मपर- मात्मनोः॥अहं त्वमेतदुभयं त्यक्त्वाखण्डं विचिन्तयेत् ॥२१९॥ अध्यारोपापवादा- भ्यां यत्र सर्वं विलीयते ॥ तद्बीजमाश्रये- द्योगी सर्वसंगविवर्जितः ॥ २२० ॥ टीका-योगी अपनेको और जीवात्मा और परमा- त्माको तुल्य माने अर्थात् भेदरहित होजाय और हम और तुम यह दोनों भावको त्यागके एक अखण्ड ब्रह्मका चिन्तन करे अध्यारोपअपवादद्वारा जिसमें सर्व वस्तुका लय होजाता है योगी सर्वसङ्गसे रहित होके उसी बीजके आश्रय होजाय अर्थात् चित्तवृत्ति- को आत्मामें लय करदे ॥ २१९ ॥ २२० ॥ मूलम्-अपरोक्षं चिदानन्दं पूर्णं त्यक्त्वा भ्र- माकुलाः ॥ परोक्षं चापरोक्षं च कृत्वा मूढा भ्रमन्ति वै ॥ २२१ ॥ टीका-मूढबुद्धिके मनुष्य अपरोक्ष अर्थात् प्रत्यक्ष परि- पूर्णब्रह्मको छोड करके भ्रममें पडके परोक्ष और अप- रोक्षका रात्रि दिवस निर्णय करते फिरते हैं ॥ २२१ ॥