शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । रोरुहे ॥ तस्याऽधो वर्तते चन्द्रस्तद्ध्यानं क्रियते बुधैः ॥ १८४ ॥ टीका-हे देवि ! पहिले जो सहस्रदलकमलके मध्यमें योनिमण्डल हमने कहा है उस योनिके अधोभागमें चन्द्रमा स्थित है यह चन्द्रमण्डलका बुद्धिमान् लोग सर्वदा ध्यान करते हैं ॥ १८४ ॥ मूलम्-यस्य स्मरणमात्रेण योगीन्द्रोऽव- निमण्डले॥पूज्यो भवति देवानां सिद्धानां सम्मतो भवेत् ॥ १८७ ॥ टीका-इस चन्द्रमंडलके ध्यानमात्रसे योगीन्द्र संसारमें पूजनीय होजाता है और देवता और सिद्ध- लोगोंके तुल्य होजाता है ॥ १८७ ॥ मूलम्-शिरःकपालविवरे ध्यायेद्दुग्धमहो- दधिम् ॥ तत्र स्थित्वा सहस्रारे पद्मे चन्द्रं विचिन्तयेत् ॥ १८८ ॥ टीका-शिरस्थित जो कपालविवर है उसमें क्षीर समुद्रका ध्यान करे उसी स्थानमें स्थितिपूर्वक सहस्र- दलकमलमें चन्द्रमाका चिन्तन करे ॥ १८८ ॥ मूलम्-शिरःकपालविवरे द्विरष्टकलयायु- तः ॥ पीयूषभानुहंसाख्यं भावयेत्तं निरं-