शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचमपटलः। ( १७९ ) टीका-हे पार्वती ! इस ब्रह्मरन्ध्रमें जिसका मन लीन होंय सो पुरुषोत्तम योगी अणिमादिगुणोंको भोगके इच्छापूर्वक हमारेमें लय होजायगा ॥ १८३ ॥ मूलम्-एतद्रन्ध्रध्यानमात्रेण मर्त्यः संसारे स्मिन्वल्लभो मे भवेत्सः ॥ पापान् जि- त्वा मुक्तिमार्गाधिकारी ज्ञानं दत्त्वा तार- यत्यद्भुतं वै ॥ १८४ ॥ टीका-हे देवी ! इस ब्रह्मरन्ध्रके ध्यानमात्रसे यह सं- सारमें प्राणी हमको प्रिय होजाता है और पापराशिको जीतके यह साधक मुक्तिमार्गका अधिकारी होजाता है और अनेक मनुष्योंको ज्ञान उपदेश करके संसार- से परित्राण करदेता है ॥ १८४ ॥ मूलम्-चतुर्मुखादित्रिदशैरगम्यं योगिवल्ल- भम् ॥ प्रयत्नेन सुगोप्यं तद्ब्रह्मरन्ध्रं म- योदितम् ॥ १८५ ॥ टीका-हे देवी ! यह ब्रह्मरन्ध्रका ध्यान जो हमने कहा है इसको यत्न करके गोपित रखना उचित है यह ज्ञान योगीलोगोंको अतिप्रिय है इसका मार्ग ब्रह्मा आदि देवताओंकोभी अगम्य.हैं ॥ १८५ ॥ मूलम्-पुरा मयोक्ता या योनिः सहस्रारे स-