भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पंचमपटलः । ( १८५) जीवी होजाता है और यही सहस्रदलकमलमें कुटरूपा कुण्डलिनी शक्तिका लय होजाता है तब यह चतुर्विध सृष्टिभी परमात्मामें लय होजाती है ॥ २०१ ॥ २०२ ॥ मूलम्-यज्ज्ञात्वा प्राप्य विषयं चित्तवृत्ति- र्विलीयते ॥ तस्मिन्परिश्रमं योगी करो- ति निरपेक्षतः ॥ २०३ ॥ टीका-यह सहस्रदलकमलके ज्ञान होनेसे अर्थात् इस विषयको प्राप्त करनेसे चित्तवृत्तिका लय होजाता है इस हेतुसे इसके ज्ञानार्थ निरपेक्षरूपसे योगी परिश्र- म करे ॥ २०३ ॥ मूलम्-चित्तवृत्तिर्यदा लीना तस्मिन्योगी भवेद्ध्रुवम्॥ तदा विज्ञायतेऽखण्डज्ञानरूपो निरञ्जनः ॥ २०४ ॥ टीका-जब योगीकी चित्तवृत्ति इसमें निश्चय लय होजायगी तब अखण्ड ज्ञानरूपी निरञ्जनका प्रकाश होगा अर्थात् ज्ञान होगा ॥ २०४ ॥ मूलम्-ब्रह्मांडबाह्ये संचिंत्य स्वप्रतीकं य- थोदितम् ॥ तमावेश्य महच्छून्यं चिन्त- येदविरोधतः॥ २०५॥ टीका-ब्रह्माण्डके बाहर अर्थात् ब्रह्मांडरूप शरीरके