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शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

पंचमपटलः । ( १८५) जीवी होजाता है और यही सहस्रदलकमलमें कुटरूपा कुण्डलिनी शक्तिका लय होजाता है तब यह चतुर्विध सृष्टिभी परमात्मामें लय होजाती है ॥ २०१ ॥ २०२ ॥ मूलम्-यज्ज्ञात्वा प्राप्य विषयं चित्तवृत्ति- र्विलीयते ॥ तस्मिन्परिश्रमं योगी करो- ति निरपेक्षतः ॥ २०३ ॥ टीका-यह सहस्रदलकमलके ज्ञान होनेसे अर्थात् इस विषयको प्राप्त करनेसे चित्तवृत्तिका लय होजाता है इस हेतुसे इसके ज्ञानार्थ निरपेक्षरूपसे योगी परिश्र- म करे ॥ २०३ ॥ मूलम्-चित्तवृत्तिर्यदा लीना तस्मिन्योगी भवेद्ध्रुवम्॥ तदा विज्ञायतेऽखण्डज्ञानरूपो निरञ्जनः ॥ २०४ ॥ टीका-जब योगीकी चित्तवृत्ति इसमें निश्चय लय होजायगी तब अखण्ड ज्ञानरूपी निरञ्जनका प्रकाश होगा अर्थात् ज्ञान होगा ॥ २०४ ॥ मूलम्-ब्रह्मांडबाह्ये संचिंत्य स्वप्रतीकं य- थोदितम् ॥ तमावेश्य महच्छून्यं चिन्त- येदविरोधतः॥ २०५॥ टीका-ब्रह्माण्डके बाहर अर्थात् ब्रह्मांडरूप शरीरके

( १८६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । बाहर पूर्वोक्त स्वप्रतीकका चिन्तन करे उससे चित्तको स्थिर करके महत् शून्यका शुद्धवृत्तिसे चिन्तन करे २०५ मूलम्-आद्यन्तमध्यशून्यं तत्कोटिसूर्यस- मप्रभम् ॥ चन्द्रकोटिप्रतीकाशमभ्यस्य सिद्धिमाप्नुयात् ॥ २०६ ॥ टीका-आदि अंत मध्य शून्य यह सर्वत्र शून्यमें कोटि सूर्यके समान प्रभा और कोटिचन्द्रके समान शीतलप्रकाशके देखनेका अभ्यास करनेसे साधकको परमसिद्धि लाभ होगी ॥ २०६ ॥ मूलम्-एतद्ध्यानं सदा कुर्यादनालस्यं दिने दिने ॥ तस्य स्यात्सकला सिद्धिर्व- त्सरान्नात्र संशयः ॥ २०७ ॥ टीका-जो पुरुष आलस्यको त्यागके सर्वदा प्रति- दिन इस शून्यका ध्यान करेगा उसको निश्चय एकवर्ष में सकल सिद्धि लाभ होगी ॥२०७ ॥ मूलम्-क्षणार्धं निश्चलं तत्र मनो यस्य भ- वेद्ध्रुवम्॥स एव योगी सद्भक्तः सर्वलोकेषु पूजितः ॥ तस्य कल्मषसङ्घातस्तत्क्षणा- देव नश्यति ॥ २०८ ॥ टीका-जो साधक इस शून्यमें अर्धक्षणभी मनको

पंचमपटलः। ( १८७ ) निश्चल स्थिर रक्खेगा वही निश्चय यथार्थ भक्त योगी है और वह सर्वलोकमें पूजित होता है और उसके पाप- का समूह उसी क्षण नष्ट होजाता है ॥ २०८ ॥ मूलम्-यं दृष्ट्वा न प्रवर्तन्ते मृत्युसंसारव- र्त्मनि॥अभ्यसेत्तं प्रयत्नेन स्वाधिष्ठानेन वर्त्मना ॥ २०९ ॥ टीका-इसके अवलोकन करनेसे मृत्युरूप जो सं- सारपथ है इसमें भ्रमण करना छूट जायगा अर्थात् जन्ममरणसे रहित होजायगा इसका अभ्यास स्वाधि- ष्ठानमार्गसे यत्न करके करना उचित है ॥ २०९ ॥ मूलम्-एतद्ध्यानस्य माहात्म्यं मया वक्तुं न शक्यते ॥ यः साधयति जानाति सोस्माकमपि सम्मतः ॥ २१० ॥ टीका-हे देवी ! इस शून्यके ध्यानके माहात्म्यको हम नहीं कहसकते अर्थात् बहुत विशेष है जो योगी इसका अभ्यास करते हैं सो जानते हैं और वह हमारे बराबर हैं ॥ २१० ॥ मूलम्-ध्यानादेव विजानाति विचित्रफल- सम्भवम् ॥ अणिमादिगुणोपेतो भवत्ये- व न संशयः ॥ २११ ॥

(१८८) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता। टीका-यह शून्यके ध्यानका विचित्र फल ध्यानसे ही जाना जाता है इसके प्रभावसे साधकको अणिमादि अष्टसिद्धि अवश्य प्राप्त होती है ॥ २११ ॥ मूलम्-राजयोगो मयाख्यातः सर्वतन्त्रेषु गोपितः॥राजाधिराजयोगोऽयं कथया- मि समासतः ॥ २१२ ॥ टीका-हे पार्वती ! यह राजयोग सर्वतन्त्रोंकरके गोपित है सो तुमसे हमने कहा है अब राजाधिराज यो- ग विस्तारसहित कहते हैं श्रवण करो ॥ २१२ ॥ मूलम्-स्वस्तिकञ्चासनं कृत्वा सुमठे जन्तु- वर्जिते ॥ गुरुं संपूज्य यत्नेन ध्यानमेत- त्समाचरेत् ॥ २१३ ॥ टीका-साधक एकांतस्थान जनरहित सुन्दर मठमें यत्नपूर्वक गुरुकी पूजा करके स्वस्तिकासनसे स्थित होके यह ध्यान करे ॥ २१३ ॥ मूलम्-निरालम्बं भवेज्जीवं ज्ञात्वा वेदान्त- युक्तितः॥निरालम्बं मनः कृत्वा न किञ्चि- च्चिन्तयेत्सुधीः ॥ २१४ ॥ टीका-बुद्धिमान् योगी वेदांतयुक्ति अनुसार जीव- को और मनको निरालम्ब करके चिन्तन करे इसके सिवाय और कुछ चिन्तना न करे ॥ २१४ ॥

पंचमपटलः । ( १८९ ) मूलम्-एतद्ध्यानान्महासिद्धिर्भवत्येव न संशयः ॥ वृत्तिहीनं मनः कृत्वा पूर्णरूपं स्वयं भवेत् ॥ २१५ ॥ टीका-इसप्रकार ध्यान करनेसे महासिद्धि उत्पन्न होगी इसमें संशय नहीं है ऐसेही मनको वृत्तिहीन करके साधक आपही पूर्ण आत्मस्वरूप होजायगा ॥ २१५ ॥ मूलम्-साधयेत्सततं यो वै सयोगी विगत- स्पृहः ॥ अहंनाम न कोप्यस्ति सर्वदा- त्मैव विद्यते ॥ २१६ ॥ टीका-जो योगी निरन्तर इसप्रकार साधन करे सो इच्छारहित है अर्थात् उसको किसी वस्तुकी इच्छा न होगी और उसके वदनसे अहंशब्द कभी उच्चारण न होगी वह सर्वदा सर्ववस्तुको आत्मस्वरूपही देखेगा ॥ २१६ ॥ मूलम्-को बन्धः कस्य वा मोक्ष एकं पश्ये- त्सदा हि सः ॥ २१७ ॥ एतत्करोति यो नित्यं स मुक्तो नात्र संशयः॥ स एव योगी सद्भक्तः सर्वलोकेषु पूजितः ॥ २१८ ॥ टीका-कौन बन्ध है और क्या मोक्ष है सर्वदा एक परिपूर्ण आत्माको देखे जो योगी यह नित्य चिन्तन क-

( १९० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेत । रता है सो मुक्त है इसमें संशय नहीं है और निश्चय वही योगी सद्‍भक्त है और सर्वलोकमें पूजनीय है २१७॥२१८॥ मूलम्-अहमस्मीति यन्मत्वा जीवात्मपर- मात्मनोः॥अहं त्वमेतदुभयं त्यक्त्वाखण्डं विचिन्तयेत् ॥२१९॥ अध्यारोपापवादा- भ्यां यत्र सर्वं विलीयते ॥ तद्बीजमाश्रये- द्योगी सर्वसंगविवर्जितः ॥ २२० ॥ टीका-योगी अपनेको और जीवात्मा और परमा- त्माको तुल्य माने अर्थात् भेदरहित होजाय और हम और तुम यह दोनों भावको त्यागके एक अखण्ड ब्रह्मका चिन्तन करे अध्यारोपअपवादद्वारा जिसमें सर्व वस्तुका लय होजाता है योगी सर्वसङ्गसे रहित होके उसी बीजके आश्रय होजाय अर्थात् चित्तवृत्ति- को आत्मामें लय करदे ॥ २१९ ॥ २२० ॥ मूलम्-अपरोक्षं चिदानन्दं पूर्णं त्यक्त्वा भ्र- माकुलाः ॥ परोक्षं चापरोक्षं च कृत्वा मूढा भ्रमन्ति वै ॥ २२१ ॥ टीका-मूढबुद्धिके मनुष्य अपरोक्ष अर्थात् प्रत्यक्ष परि- पूर्णब्रह्मको छोड करके भ्रममें पडके परोक्ष और अप- रोक्षका रात्रि दिवस निर्णय करते फिरते हैं ॥ २२१ ॥

पंचमपटलः । ( १९१ ) मूलम्-चराचरमिदं विश्वं परोक्षं यः करो- ति च ॥ अपरोक्षं परं ब्रह्म त्यक्तं बस्मिन् प्रलीयते ॥ २२२ ॥ टीका-जो मनुष्य यह चराचरसंसारको शास्त्रसे विवाद करके परोक्ष करते हैं और अपरोक्ष परब्रह्मको त्यागदेते हैं अर्थात् ब्रह्मभी प्राप्त नहीं होता वह अज्ञानी संसारमें लय होते हैं अर्थात् उनका मोक्ष नहीं होता है ॥ २२२ ॥ मूलम्-ज्ञानकारणमज्ञानं यथा नोत्पद्यते भृशम् ॥ अभ्यासं कुरुते योगी सदा सङ्गविवर्जितम् ॥ २२३ ॥ टीका-जिससे ज्ञान उत्पन्न होता है और अज्ञान- का नाश होता है इसी योगअभ्यासको योगी सर्वदा सङ्गरहित होके अभ्यास करे ॥ २२३ ॥ मूलम्-सर्वेन्द्रियाणि संयम्य विषयेभ्यो विचक्षणः॥ विषयेभ्यः सुषुप्त्यैव तिष्ठेत्सङ्ग- विवर्जितः ॥ २२४ ॥ टीका-बुद्धिमान् योगी विषयोंसे इंद्रियोंको रोकके सङ्गरहित होके विषयके त्यागमें सुषुप्तिके समान स्थिर रहते हैं ॥ २२४ ॥

( १९२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-एवमभ्यासतो नित्यं स्वप्रकाशं प्र- काशते ॥ श्रोतुं बुद्धिसमर्थार्थं निवर्तन्ते गुरोर्गिरः ॥ तदभ्यासवशादेकं स्वतो ज्ञा- नं प्रवर्तते ॥ २२५ ॥ टीका-इसी प्रकार नित्य अभ्यास करनेसे साधक- को आपही ज्ञानका प्रकाश होगा तब गुरुके वचनकी निवृत्ति होगी अर्थात् गुरुके उपदेशका अंत हो जा- यगा जब इतरवाक्य श्रवण करनेकी इच्छा निवृत्त होजायगी तब यह योगअभ्यासद्वारा आपही एक अद्वैतज्ञानमें प्रवृत्ति होगी ॥ २२५ ॥ मूलम्-यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मन- सा सह॥ साधनादमलं ज्ञानं स्वयं स्फुरति तद्भवम् ॥ २२६ ॥ टीका-यह ब्रह्म किसी प्रकार प्राप्त नहीं होता मन वाक्यकाभी गमन नहीं है परन्तु यह योगसाधनसे आ- पही निर्मल ज्ञान प्रकाश होता है ॥ २२६ ॥ मूलम्-हठं विना राजयोगो राजयोगं विना हठः ॥ तस्मात्प्रवर्तते योगी हठे सद्गुरु- मार्गतः ॥ २२७ ॥

पंचमपटलः । ( १९३ ) टीका-हठयोगके बिना राजयोग और राजयोगके बिना हठयोग सिद्ध नहीं होता इस हेतुसे योगीको उचित है कि, योगवेत्ता सद्गुरूद्वाग हठयोगमें प्रवृत्त हो ॥ २२७ ॥ मूलम्-स्थिते देहे जीवात् च योगं न श्रि- यते भृशम् ॥ इन्द्रियार्थोपभोगेषु स जी- वति न संशयः ॥ २२८ ॥ टीका-जो मनुष्य इस शरीरसे योगका आसङ्ग नहीं ग्रहण करते हैं वह केवल इंद्रियोंके भोग भोगनेके अर्थ संसारमें जीते हैं इसमें संशय नहीं है ॥ २२८ ॥ मूलम्-अभ्यासपाकपर्यन्तं मितान्नं स्मर- णं भवेत् ॥ अन्यथा साधनं धीमान्कर्तुं पारयतीह न ॥ २२९ ॥ टीका-बुद्धिमान् साधक योगे अभ्यासके आरंभसे अभ्याससिद्धिपर्यंत मिताहारी रहे अर्थात् प्रमाणका भोजन करे अन्यथा अर्थात् अप्रमाण भोजन करनेसे योग अभ्यासके पार न होगा अर्थात् सिद्ध न होगा ॥ २२९ ॥ मूलम्-अतीवसाधुसंलापं साधुसम्मति- बुद्धिमान्॥करोति पिण्डरक्षार्थं बह्वालाप-

( १९४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । विवर्जितः ॥२३०॥ त्याज्यते त्यज्यते स- ङ्गं सर्वथा त्यज्यते भृशम्॥अन्यथा न ल- भेन्मुक्तिं सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥२३१॥ टीका-बुद्धिमान् साधक सभामें साधुके समान थोडा और प्रमाण वाक्य बोले और शरीरके रक्षार्थ थोडा भोजन करे और संगको सर्व प्रकारसे तजदे कदापि किसीके संगमें लिप्त न होय हे पार्वति ! और दूसरे प्रकार कदापि मुक्ति नहीं पावेगा यह हम सर्वथा सत्य कहते हैं इसमें संशय नहीं है ॥२३० ॥ २३१ ॥ मूलम्-गुह्यैव क्रियतेऽभ्यासः संगं त्यक्त्वा तदन्तरे ॥ व्यवहाराय कर्तव्यो बाह्यसं- गो न रागतः ॥ २३२ ॥ स्वे स्वे कर्मणि वर्तन्ते सर्वे ते कर्मसम्भवाः॥निमित्तमात्रं करणे न दोषोस्ति कदाचन ॥ २३३ ॥ टीका-साधक संगरहित होके एकान्त स्थानमें योगसाधन करे यदि संसारी मनुष्योंसे व्यवहार वर्त- नेकी इच्छा करे तो अन्तर प्रीतिरहित होके , बाह्यसंग करे और अपना आश्रम धर्म कर्मभी इसी प्रकार कर- ता रहे इस हेतुसे कि, ज्ञानादि यावत् कर्म हैं सब कर्मा- नुसार होते हैं फलइच्छारहित होके केवल निमित्त

पंचमपटलः । ( १९५ ) मात्र कर्म करनेसे कदापि दोष नहीं है ॥२३२॥२३३॥ मूलम्-एवं निश्चित्य सुधिया गृहस्थोपि यदाचरेत् ॥ तदा सिद्धिमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ २३४ ॥ टीका-इसी प्रकार निश्चयबुद्धिसे यदि गृहस्थभी योगअभ्यास करे तो वह अवश्य सिद्धि लाभ करेगा इसमें संशय नहीं है ॥ २३४ ॥ मूलम्-पापपुण्यविनिर्मुक्तः परित्यक्ताङ्गसा- धकः॥यो भवेत्स विमुक्तः स्याद्गृहे ति- ष्ठन्सदा गृही ॥ २३५ ॥ न पापपुण्यैर्लि- प्येत योगयुक्तो यदा गृही ॥ कुर्वन्नपि तदा पापान्स्वकार्ये लोकसंग्रहे ॥२३६॥ टीका-जो साधक पाप पुण्यसे निर्लिप्त इन्द्रियस- गत्यागी है सोई गृही साधक गृहमें रहके मुक्त है योग- युक्त गृही पाप पुण्यमें बद्ध नहीं होता यदि संसारके संग्रहमें पापभी करेगा तो वह पाप उसको स्पर्श न करेगा ॥ २३५ ॥ २३६ ॥ मूलम्-अधुना संप्रवक्ष्यामि मन्त्रसाधन- मुत्तमम् ॥ ऐहिकामुष्मिकंसुखं येन स्या- दविरोधतः ॥ २३७॥

(१९६) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-हे देवि ! अब उत्तम मन्त्रसाधन हम कहते हैं जिससे इस लोक और परलोक दोनों स्थानमें साधक आनन्दपूर्वक सुख भोगेगा ॥ २३७ ॥ मूलम्-यस्मिन्मन्त्रे वरे ज्ञाते योगसिद्धिर्भ- वेत्खलु ॥ योगेन साधकेन्द्रस्य सर्वैश्वर्य- सुखप्रदा ॥ २३८ ॥ टीका-यह उत्तम मन्त्रके ज्ञान होनेसे निश्चय योग सिद्ध होता है साधकेन्द्रको यह योग सर्व ऐश्वर्य सुखका दाता है ॥ २३८ ॥ मूलम्-मूलाधारेस्ति यत्पद्मं चतुर्दलसम- न्वितम् ॥ तन्मध्ये वाग्भवं बीजं विस्फु- रन्तं तडित्प्रभम् ॥२३९॥ हृदये कामबी- जंतु बन्धूककुसुमप्रभम् ॥ आज्ञारविन्दे शक्त्याख्यं चन्द्रकोटिसमप्रभम्॥२४०॥ बीजत्रयमिदं गोप्यं भुक्तिमुक्तिफलप्र- दम् ॥ एतन्मन्त्रत्रयं योगी साधयेत्सि- द्धिसाधकः ॥ २४१ ॥ टीका-जो मूलाधार चतुर्दलसंयुक्त पद्म है उसमें विद्युतके समान प्रभायुक्त वाग्बीजकी स्थिति है और हृदयकमलमें बन्धूकपुष्पके समान प्रभायुक्त कामबी-

पंचमपटलः। ( १९७) जकी स्थिति है और आज्ञाकमलमें कोटिचन्द्रके समान प्रभायुक्त शक्तिबीजकी स्थिति है यह बीजत्रय परम गोपनीय भोग और मुक्तिके दाता हैं यह तीनों मन्त्रका साधक योगी अवश्यसाधन करे॥२३९॥२४०॥२४१॥ मूलम्-एतन्मन्त्रं गुरोर्लब्ध्वा न द्रुतं न वि- लम्बितम्॥ अक्षराक्षरसन्धानं निःसन्दि- ग्धमना जपेत् ॥ २४२ ॥ टीका-साधक गुरुसे यह मन्त्रका उपदेश लेके धी- रे धीरे अक्षर अक्षर स्पष्ट उच्चारणपूर्वक स्थिर मन हो- के जप करे ॥ २४२ ॥ मूलम्-तद्गतश्चैकचित्तश्च शास्त्रोक्तविधिना सुधीः॥ देव्यास्तु पुरतो लक्षं हुत्वा लक्ष- त्रयं जपेत् ॥ २४३ ॥ टीका-बुद्धिमान् साधक एकाग्रचित्तसे शास्त्रवि- धिअनुसार देवीके समीपमें एक लक्ष होम करके ती- नलक्ष जप करे ॥ २४३ ॥ मूलम्--करवीरप्रसूनन्तु गुडक्षीराज्यसंयु- तम् ॥ कुण्डे योन्याकृते धीमाञ्जपान्ते जुहुयात्सुधीः ॥ २४४ ॥ टीका-बुद्धिमान् साधक जपके पीछे योन्याकार-

( १९८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । कुण्ड बनायके कनेरपुष्पके साथ गुड और दूध और घृत मिलायके होम करे ॥ २४४ ॥ मूलम्-अनुष्ठाने कृते धीमान्पूर्वसेवा कृता भवेत् ॥ ततो ददाति कामान्वै देवी त्रिपु- रभैरवी ॥ २४५ ॥ टीका-बुद्धिमान् साधक इसीप्रकार अनुष्ठानपूर्वक आराधना करके त्रिपुरभैरवी देवीको सन्तुष्ट करे तो उसको इच्छापूर्वक देवी फल देती है ॥ २४५ ॥ मूलम्-गुरुं सन्तोष्य विधिवल्लब्ध्वा म- न्त्रवरोत्तमम् ॥ अनेन विधिना युक्तो म- न्दभाग्योऽपि सिद्ध्यति ॥ २४६ ॥ टीका-साधक विधिपूर्वक गुरुको संतोप करके यह उत्तम मन्त्र ग्रहण करे इस विधानसंयुक्त ग्रहण कर- नेसे मन्दभाग्य साधकभी सिद्धि लाभ करते हैं ॥२४६॥ मूलम्-लक्षमेकं जपेद्यस्तु साधको विजिते- न्द्रियः ॥ २४७ ॥ दर्शनात्तस्य क्षुभ्यन्ते योषितो मदनातुराः ॥ पतन्ति साधक- स्याग्रे निर्लज्जा भयवर्जिताः॥ २४८ ॥ टीका-योगी इन्द्रियनिग्रहपूर्वक एक लक्ष जप करे तो उसके दर्शनमात्रसे कामातुर स्त्रियें मोहित

पंचमपटलः । ( ३९९ ) होयके साधकके आगे निर्लज्ज और भयरहित होके गिरती हैं ॥ २४७ ॥ २४८ ॥ मूलम्-जप्तेन च द्विलक्षेण ये यस्मिन्विषये स्थिताः॥आगच्छन्ति यथातीर्थं विमुक्त- कुलविग्रहाः ॥ ददति तस्य सर्वस्वं तस्यै- व च वशे स्थिताः ॥ २४९ ॥ टीका-यह मन्त्र दो लक्ष जप करनेसे कामिनी स्त्रियें साधकके समीप इसप्रकार आतीहैं कि, जैसे कुलीना तीर्थोंमें भय लज्जा रहित होके जाती हैं और साधकके वशमें होके अपना सर्वस्व उसको देती हैं ॥ २४९ ॥ मूलम्-त्रिभिर्लक्षैस्तथाजप्तैर्मण्डलीका स- मण्डलाः ॥ २५० ॥ वशमायान्ति ते सर्वे नात्र कार्या विचारणा॥ षड्भिर्लक्षैर्महीपालं सभृत्यबलवाहनम् ॥ २५१ ॥ टीका-तीन लक्ष जप करनेसे मंडलसहित मंडल- पती राजा साधकके वशमें होजाँयगे इसमें संशय नहीं है और छः लक्ष जप करनेसे बल वाहन संयुक्त राजा साधकके वश होजायगा ॥ २५० ॥ २५१ ॥ मूलम्-लक्षैर्द्वादशभिर्जप्तैर्यक्षरक्षोरगेश्व-

( २०० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । राः॥वशमायान्ति ते सर्व आज्ञां कुर्वन्ति नित्यशः ॥ २५२ ॥ टीका-यह मन्त्र बारह लक्ष जप करनेसे यक्ष और राक्षस और पन्नग यह सब वशमें होके साधककी नि- त्य आज्ञा पालन करतेहैं ॥ २५२ ॥ मूलम्-त्रिपञ्चलक्षजपैस्तु साधकेन्द्रस्य धीमतः॥सिद्धविद्याधराश्चैव गन्धर्वाप्सर- सांगणाः ॥ २५३ ॥ वशमायान्ति ते सर्वे नात्र कार्या विचारणा ॥ हठाच्छ्रवणवि- ज्ञानं सर्वज्ञत्वं प्रजायते ॥ २५४ ॥ टीका-पन्द्रहलक्ष जप करनेसे सिद्ध और विद्याधर और गंधर्व और अप्सरा यह सब बुद्धिमान् साधकके वशमें होजातेहैं इसमें संदेह नहीं है और साधकको हठसे विशेष श्रवणशक्ति होगी और सर्ववस्तुका ज्ञान उत्पन्न होगा ॥ २५३ ॥ २५४ ॥ मूलम्-तथाष्टादशभिर्लक्षैर्देहेनानेन साध- कः ॥ उत्तिष्ठेन्मेदिनीं त्यक्त्वा दिव्यदेह- स्तु जायते ॥ भ्रमते स्वेच्छया लोके छि- द्रां पश्यति मेदिनीम् ॥ २५५ ॥ टीका-जो साधक अठारह लक्ष जप करेगा वह भू-

पंचमपटलः । ( २०१ ) मिको त्यागके दिव्य देह होके आकाशमार्गसे संसारमें इच्छापूर्वक भ्रमण करेगा और पृथ्वीके छिद्रोंको देखे- गा अर्थात् पृथ्वीमें प्रवेश करनेके मार्ग देखेगा ॥२५५॥ मूलम्-अष्टाविंशतिभिर्लक्षैर्विद्याधरपतिर्भ- वेत् ॥ साधकस्तु भवेद्धीमान्कामरूपो म- हाबलः ॥ २५६ ॥ त्रिंशल्लक्षैस्तथाऽजस्रैर्ब्र- ह्मविष्णुसमो भवेत् ॥ रुद्रत्वं षष्टिभिर्लक्षै- रमरत्वमशीतिभिः ॥ २५७॥ कोट्यैकया महायोगी लीयते परमे पदे ॥ साधकस्तु भवत्यागी त्रैलोक्ये सोऽतिदुर्लभः॥२५८॥ टीका-जो बुद्धिमान् साधक अट्ठाईस लक्ष जप करे- गा वह महाबल कामरूपी और विद्याधरपति होजायगा और तीस लक्ष जप करनेसे साधक ब्रह्मा विष्णुके समान होजायगा और साठ लक्ष जप करनेसे रुद्रके समान हो- जायगा और अस्सी लक्ष जप करनेसे साधक सर्व भूतोंको प्रिय देव होजायगा और एककोटि जप करनेसे साधक महायोगी होयके परमपदमें लीन होजाताहै हे पार्वति ! इसप्रकार योगी त्रिभुवनमें दुर्लभहै॥२५६।२५७।२५८॥ मूलम्-त्रिपुरे त्रिपुरन्त्वेकं शिवं परमकार- णम् ॥ २५९ ॥ अक्षय्यं तत्पदं शान्तमप्र-

( २०२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मेयमनामयम् ॥ लभतेऽसौ नसन्देहोधी- मान्सर्वमभीप्सितम् ॥ २६० ॥ टीका-हे पार्वति ! त्रिपुरस्थानमें एक शिवही परम का- रण स्वरूप हैं उनका चरणकमल अक्षय शान्त अप्रमेय अर्थात् प्रमाणरहित अनामय अर्थात् रोगरहित है उनका पद बुद्धिमान् योगीलोगही इच्छापूर्वक लाभ करते हैं इसमें संदेह नहीं है ॥ २५९ ॥ २६० ॥ मूलम्-शिवविद्या महाविद्या गुप्ता चाग्रे महें- श्वरी ॥ मद्भाषितमिदं शास्त्रं गोपनीयमतो बुधैः ॥ २६१ ॥ टीका-हे महादेवि ! यह हमारी कहीहुई महाविद्या- कोही शिवविद्या कहते हैं यह विद्या सर्वप्रकार गोपनीय है इस योगशास्त्रको बुद्धिमान् लोग कदापि प्रकाश नहीं करते हैं ॥ २६१ ॥ मूलम्-हठविद्या परं गोप्या योगिना सिद्धि- मिच्छता ॥ भवेद्वीर्यवती गुप्ता निर्वीर्या च प्रकाशिता ॥ २६२ ॥ टीका-सिद्धिकांक्षी योगीलोग इस हठविद्याको अतिगोपित रक्खें यह गोप्य रखनेसे वीर्यवती रहतीहै और प्रकाश करनेसे निर्वीर्या होजातीहै ॥ २६२ ॥

पंचमपटलः । ( २०३ ) मूलम्-य इदं पठते नित्यमाद्योपान्तं विच- क्षणः ॥ योगसिद्धिर्भवेत्तस्य क्रमेणैव न संशयः ॥ स मोक्षं लभते धीमान्य इदं नित्यमर्चयेत् ॥ २६३ ॥ टीका-जो विद्वान् यह शिवसंहिताका नित्य आ द्योपान्त पाठ करेगा उसको क्रमसे अवश्य योगसिद्धि होगी और जो बुद्धिमान् इस ग्रन्थका नित्य पूजन क- रेगा उसको मुक्ति लाभ होगी ॥ २६३ ॥ मूलम्-मोक्षार्थिभ्यश्च सर्वेभ्यः साधुभ्यः श्रावयेदपि॥२६४॥क्रियायुक्तस्य सिद्धिः स्यादक्रियस्य कथम्भवेत् ॥ तस्मात्क्रिया विधानेन कर्तव्या योगिपुंगवैः ॥ २६५॥ यदच्छालाभसन्तुष्टः सन्त्यक्तान्तरसंग- कः॥ गृहस्थश्चाप्यनासक्तः स मुक्तो यो- गसाधनात् ॥ २६६ ॥ , टीका-मोक्षार्थी और सर्व साधु मनुष्य उनको यह शिवसंहिताग्रंथ सुनाना. जो क्रियासे युक्त होगा उसको सिद्धि प्राप्त होगी क्रियाहीन मनुष्यको क्या होसक्ता है अर्थात् सिद्धि लाभ.नहीं होसकती विधानपूर्वक क्रियाका अनुष्ठान करे तो इच्छापूर्वक लाभसे सन्तुष्ट होगा और

( २०४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । जो गृहस्थ होगा और इन्द्रियोंमें आसक्त न होगा सो मनु- ष्य योगसाधनसे मुक्तहोगा ॥ २६४॥ २६५ ॥ २६६ ॥ मूलम्-गृहस्थानां भवेत्सिद्धिरीश्वराणां जपेन वै ॥ योगक्रियाभियुक्तानां तस्मा- त्संयतते गृही ॥ २६७ ॥ टीका-योगक्रियावान् गृहस्थ लोगोंको जप करनेसे सिद्धि प्राप्तहोगी इस हेतुसे योगसाधनमें गृहस्थ मनु- ष्यको यत्न करना उचित है ॥ २६७ ॥ मूलम्-गेहे स्थित्वा पुत्रदारादिपूर्णः सङ्गं त्यक्त्वा चान्तरे योगमार्गे॥ सिद्धेश्चिह्नं वी- क्ष्य पश्चाद् गृहस्थः क्रीडेत्सो वै संमतं साधयित्वा ॥ २६८ ॥ टीका-जो गृहस्थ गृहमें रहके स्त्रीपुत्रादिसे पूर्ण होके अंतरीय सबसे त्यागपूर्वक योगसाधनसे प्रवृत्त होय सो सिद्धिचिह्न अवलोकनपूर्वक साधना करके सर्वदा आनन्दमें क्रीडा करेगा ॥ २६८ ॥ इति श्रीशिवसंहितायां हरगौरीसंवादे योगशास्त्रे पंचमः पटलः समाप्तः ॥ ५ ॥ शुभम् ॥ समाप्तोऽयं ग्रन्थः । पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज, श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर" छापाखाना, खेतवाड़ी-बंबई.