भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 216 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 198

( १९४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । विवर्जितः ॥२३०॥ त्याज्यते त्यज्यते स- ङ्गं सर्वथा त्यज्यते भृशम्॥अन्यथा न ल- भेन्मुक्तिं सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥२३१॥ टीका-बुद्धिमान् साधक सभामें साधुके समान थोडा और प्रमाण वाक्य बोले और शरीरके रक्षार्थ थोडा भोजन करे और संगको सर्व प्रकारसे तजदे कदापि किसीके संगमें लिप्त न होय हे पार्वति ! और दूसरे प्रकार कदापि मुक्ति नहीं पावेगा यह हम सर्वथा सत्य कहते हैं इसमें संशय नहीं है ॥२३० ॥ २३१ ॥ मूलम्-गुह्यैव क्रियतेऽभ्यासः संगं त्यक्त्वा तदन्तरे ॥ व्यवहाराय कर्तव्यो बाह्यसं- गो न रागतः ॥ २३२ ॥ स्वे स्वे कर्मणि वर्तन्ते सर्वे ते कर्मसम्भवाः॥निमित्तमात्रं करणे न दोषोस्ति कदाचन ॥ २३३ ॥ टीका-साधक संगरहित होके एकान्त स्थानमें योगसाधन करे यदि संसारी मनुष्योंसे व्यवहार वर्त- नेकी इच्छा करे तो अन्तर प्रीतिरहित होके , बाह्यसंग करे और अपना आश्रम धर्म कर्मभी इसी प्रकार कर- ता रहे इस हेतुसे कि, ज्ञानादि यावत् कर्म हैं सब कर्मा- नुसार होते हैं फलइच्छारहित होके केवल निमित्त

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक) · पृष्ठ 198, कुल 216 में से · BharatKosha