शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
( १९४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । विवर्जितः ॥२३०॥ त्याज्यते त्यज्यते स- ङ्गं सर्वथा त्यज्यते भृशम्॥अन्यथा न ल- भेन्मुक्तिं सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥२३१॥ टीका-बुद्धिमान् साधक सभामें साधुके समान थोडा और प्रमाण वाक्य बोले और शरीरके रक्षार्थ थोडा भोजन करे और संगको सर्व प्रकारसे तजदे कदापि किसीके संगमें लिप्त न होय हे पार्वति ! और दूसरे प्रकार कदापि मुक्ति नहीं पावेगा यह हम सर्वथा सत्य कहते हैं इसमें संशय नहीं है ॥२३० ॥ २३१ ॥ मूलम्-गुह्यैव क्रियतेऽभ्यासः संगं त्यक्त्वा तदन्तरे ॥ व्यवहाराय कर्तव्यो बाह्यसं- गो न रागतः ॥ २३२ ॥ स्वे स्वे कर्मणि वर्तन्ते सर्वे ते कर्मसम्भवाः॥निमित्तमात्रं करणे न दोषोस्ति कदाचन ॥ २३३ ॥ टीका-साधक संगरहित होके एकान्त स्थानमें योगसाधन करे यदि संसारी मनुष्योंसे व्यवहार वर्त- नेकी इच्छा करे तो अन्तर प्रीतिरहित होके , बाह्यसंग करे और अपना आश्रम धर्म कर्मभी इसी प्रकार कर- ता रहे इस हेतुसे कि, ज्ञानादि यावत् कर्म हैं सब कर्मा- नुसार होते हैं फलइच्छारहित होके केवल निमित्त
पंचमपटलः । ( १९५ ) मात्र कर्म करनेसे कदापि दोष नहीं है ॥२३२॥२३३॥ मूलम्-एवं निश्चित्य सुधिया गृहस्थोपि यदाचरेत् ॥ तदा सिद्धिमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ २३४ ॥ टीका-इसी प्रकार निश्चयबुद्धिसे यदि गृहस्थभी योगअभ्यास करे तो वह अवश्य सिद्धि लाभ करेगा इसमें संशय नहीं है ॥ २३४ ॥ मूलम्-पापपुण्यविनिर्मुक्तः परित्यक्ताङ्गसा- धकः॥यो भवेत्स विमुक्तः स्याद्गृहे ति- ष्ठन्सदा गृही ॥ २३५ ॥ न पापपुण्यैर्लि- प्येत योगयुक्तो यदा गृही ॥ कुर्वन्नपि तदा पापान्स्वकार्ये लोकसंग्रहे ॥२३६॥ टीका-जो साधक पाप पुण्यसे निर्लिप्त इन्द्रियस- गत्यागी है सोई गृही साधक गृहमें रहके मुक्त है योग- युक्त गृही पाप पुण्यमें बद्ध नहीं होता यदि संसारके संग्रहमें पापभी करेगा तो वह पाप उसको स्पर्श न करेगा ॥ २३५ ॥ २३६ ॥ मूलम्-अधुना संप्रवक्ष्यामि मन्त्रसाधन- मुत्तमम् ॥ ऐहिकामुष्मिकंसुखं येन स्या- दविरोधतः ॥ २३७॥
(१९६) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-हे देवि ! अब उत्तम मन्त्रसाधन हम कहते हैं जिससे इस लोक और परलोक दोनों स्थानमें साधक आनन्दपूर्वक सुख भोगेगा ॥ २३७ ॥ मूलम्-यस्मिन्मन्त्रे वरे ज्ञाते योगसिद्धिर्भ- वेत्खलु ॥ योगेन साधकेन्द्रस्य सर्वैश्वर्य- सुखप्रदा ॥ २३८ ॥ टीका-यह उत्तम मन्त्रके ज्ञान होनेसे निश्चय योग सिद्ध होता है साधकेन्द्रको यह योग सर्व ऐश्वर्य सुखका दाता है ॥ २३८ ॥ मूलम्-मूलाधारेस्ति यत्पद्मं चतुर्दलसम- न्वितम् ॥ तन्मध्ये वाग्भवं बीजं विस्फु- रन्तं तडित्प्रभम् ॥२३९॥ हृदये कामबी- जंतु बन्धूककुसुमप्रभम् ॥ आज्ञारविन्दे शक्त्याख्यं चन्द्रकोटिसमप्रभम्॥२४०॥ बीजत्रयमिदं गोप्यं भुक्तिमुक्तिफलप्र- दम् ॥ एतन्मन्त्रत्रयं योगी साधयेत्सि- द्धिसाधकः ॥ २४१ ॥ टीका-जो मूलाधार चतुर्दलसंयुक्त पद्म है उसमें विद्युतके समान प्रभायुक्त वाग्बीजकी स्थिति है और हृदयकमलमें बन्धूकपुष्पके समान प्रभायुक्त कामबी-
पंचमपटलः। ( १९७) जकी स्थिति है और आज्ञाकमलमें कोटिचन्द्रके समान प्रभायुक्त शक्तिबीजकी स्थिति है यह बीजत्रय परम गोपनीय भोग और मुक्तिके दाता हैं यह तीनों मन्त्रका साधक योगी अवश्यसाधन करे॥२३९॥२४०॥२४१॥ मूलम्-एतन्मन्त्रं गुरोर्लब्ध्वा न द्रुतं न वि- लम्बितम्॥ अक्षराक्षरसन्धानं निःसन्दि- ग्धमना जपेत् ॥ २४२ ॥ टीका-साधक गुरुसे यह मन्त्रका उपदेश लेके धी- रे धीरे अक्षर अक्षर स्पष्ट उच्चारणपूर्वक स्थिर मन हो- के जप करे ॥ २४२ ॥ मूलम्-तद्गतश्चैकचित्तश्च शास्त्रोक्तविधिना सुधीः॥ देव्यास्तु पुरतो लक्षं हुत्वा लक्ष- त्रयं जपेत् ॥ २४३ ॥ टीका-बुद्धिमान् साधक एकाग्रचित्तसे शास्त्रवि- धिअनुसार देवीके समीपमें एक लक्ष होम करके ती- नलक्ष जप करे ॥ २४३ ॥ मूलम्--करवीरप्रसूनन्तु गुडक्षीराज्यसंयु- तम् ॥ कुण्डे योन्याकृते धीमाञ्जपान्ते जुहुयात्सुधीः ॥ २४४ ॥ टीका-बुद्धिमान् साधक जपके पीछे योन्याकार-
( १९८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । कुण्ड बनायके कनेरपुष्पके साथ गुड और दूध और घृत मिलायके होम करे ॥ २४४ ॥ मूलम्-अनुष्ठाने कृते धीमान्पूर्वसेवा कृता भवेत् ॥ ततो ददाति कामान्वै देवी त्रिपु- रभैरवी ॥ २४५ ॥ टीका-बुद्धिमान् साधक इसीप्रकार अनुष्ठानपूर्वक आराधना करके त्रिपुरभैरवी देवीको सन्तुष्ट करे तो उसको इच्छापूर्वक देवी फल देती है ॥ २४५ ॥ मूलम्-गुरुं सन्तोष्य विधिवल्लब्ध्वा म- न्त्रवरोत्तमम् ॥ अनेन विधिना युक्तो म- न्दभाग्योऽपि सिद्ध्यति ॥ २४६ ॥ टीका-साधक विधिपूर्वक गुरुको संतोप करके यह उत्तम मन्त्र ग्रहण करे इस विधानसंयुक्त ग्रहण कर- नेसे मन्दभाग्य साधकभी सिद्धि लाभ करते हैं ॥२४६॥ मूलम्-लक्षमेकं जपेद्यस्तु साधको विजिते- न्द्रियः ॥ २४७ ॥ दर्शनात्तस्य क्षुभ्यन्ते योषितो मदनातुराः ॥ पतन्ति साधक- स्याग्रे निर्लज्जा भयवर्जिताः॥ २४८ ॥ टीका-योगी इन्द्रियनिग्रहपूर्वक एक लक्ष जप करे तो उसके दर्शनमात्रसे कामातुर स्त्रियें मोहित
पंचमपटलः । ( ३९९ ) होयके साधकके आगे निर्लज्ज और भयरहित होके गिरती हैं ॥ २४७ ॥ २४८ ॥ मूलम्-जप्तेन च द्विलक्षेण ये यस्मिन्विषये स्थिताः॥आगच्छन्ति यथातीर्थं विमुक्त- कुलविग्रहाः ॥ ददति तस्य सर्वस्वं तस्यै- व च वशे स्थिताः ॥ २४९ ॥ टीका-यह मन्त्र दो लक्ष जप करनेसे कामिनी स्त्रियें साधकके समीप इसप्रकार आतीहैं कि, जैसे कुलीना तीर्थोंमें भय लज्जा रहित होके जाती हैं और साधकके वशमें होके अपना सर्वस्व उसको देती हैं ॥ २४९ ॥ मूलम्-त्रिभिर्लक्षैस्तथाजप्तैर्मण्डलीका स- मण्डलाः ॥ २५० ॥ वशमायान्ति ते सर्वे नात्र कार्या विचारणा॥ षड्भिर्लक्षैर्महीपालं सभृत्यबलवाहनम् ॥ २५१ ॥ टीका-तीन लक्ष जप करनेसे मंडलसहित मंडल- पती राजा साधकके वशमें होजाँयगे इसमें संशय नहीं है और छः लक्ष जप करनेसे बल वाहन संयुक्त राजा साधकके वश होजायगा ॥ २५० ॥ २५१ ॥ मूलम्-लक्षैर्द्वादशभिर्जप्तैर्यक्षरक्षोरगेश्व-
( २०० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । राः॥वशमायान्ति ते सर्व आज्ञां कुर्वन्ति नित्यशः ॥ २५२ ॥ टीका-यह मन्त्र बारह लक्ष जप करनेसे यक्ष और राक्षस और पन्नग यह सब वशमें होके साधककी नि- त्य आज्ञा पालन करतेहैं ॥ २५२ ॥ मूलम्-त्रिपञ्चलक्षजपैस्तु साधकेन्द्रस्य धीमतः॥सिद्धविद्याधराश्चैव गन्धर्वाप्सर- सांगणाः ॥ २५३ ॥ वशमायान्ति ते सर्वे नात्र कार्या विचारणा ॥ हठाच्छ्रवणवि- ज्ञानं सर्वज्ञत्वं प्रजायते ॥ २५४ ॥ टीका-पन्द्रहलक्ष जप करनेसे सिद्ध और विद्याधर और गंधर्व और अप्सरा यह सब बुद्धिमान् साधकके वशमें होजातेहैं इसमें संदेह नहीं है और साधकको हठसे विशेष श्रवणशक्ति होगी और सर्ववस्तुका ज्ञान उत्पन्न होगा ॥ २५३ ॥ २५४ ॥ मूलम्-तथाष्टादशभिर्लक्षैर्देहेनानेन साध- कः ॥ उत्तिष्ठेन्मेदिनीं त्यक्त्वा दिव्यदेह- स्तु जायते ॥ भ्रमते स्वेच्छया लोके छि- द्रां पश्यति मेदिनीम् ॥ २५५ ॥ टीका-जो साधक अठारह लक्ष जप करेगा वह भू-
पंचमपटलः । ( २०१ ) मिको त्यागके दिव्य देह होके आकाशमार्गसे संसारमें इच्छापूर्वक भ्रमण करेगा और पृथ्वीके छिद्रोंको देखे- गा अर्थात् पृथ्वीमें प्रवेश करनेके मार्ग देखेगा ॥२५५॥ मूलम्-अष्टाविंशतिभिर्लक्षैर्विद्याधरपतिर्भ- वेत् ॥ साधकस्तु भवेद्धीमान्कामरूपो म- हाबलः ॥ २५६ ॥ त्रिंशल्लक्षैस्तथाऽजस्रैर्ब्र- ह्मविष्णुसमो भवेत् ॥ रुद्रत्वं षष्टिभिर्लक्षै- रमरत्वमशीतिभिः ॥ २५७॥ कोट्यैकया महायोगी लीयते परमे पदे ॥ साधकस्तु भवत्यागी त्रैलोक्ये सोऽतिदुर्लभः॥२५८॥ टीका-जो बुद्धिमान् साधक अट्ठाईस लक्ष जप करे- गा वह महाबल कामरूपी और विद्याधरपति होजायगा और तीस लक्ष जप करनेसे साधक ब्रह्मा विष्णुके समान होजायगा और साठ लक्ष जप करनेसे रुद्रके समान हो- जायगा और अस्सी लक्ष जप करनेसे साधक सर्व भूतोंको प्रिय देव होजायगा और एककोटि जप करनेसे साधक महायोगी होयके परमपदमें लीन होजाताहै हे पार्वति ! इसप्रकार योगी त्रिभुवनमें दुर्लभहै॥२५६।२५७।२५८॥ मूलम्-त्रिपुरे त्रिपुरन्त्वेकं शिवं परमकार- णम् ॥ २५९ ॥ अक्षय्यं तत्पदं शान्तमप्र-
( २०२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मेयमनामयम् ॥ लभतेऽसौ नसन्देहोधी- मान्सर्वमभीप्सितम् ॥ २६० ॥ टीका-हे पार्वति ! त्रिपुरस्थानमें एक शिवही परम का- रण स्वरूप हैं उनका चरणकमल अक्षय शान्त अप्रमेय अर्थात् प्रमाणरहित अनामय अर्थात् रोगरहित है उनका पद बुद्धिमान् योगीलोगही इच्छापूर्वक लाभ करते हैं इसमें संदेह नहीं है ॥ २५९ ॥ २६० ॥ मूलम्-शिवविद्या महाविद्या गुप्ता चाग्रे महें- श्वरी ॥ मद्भाषितमिदं शास्त्रं गोपनीयमतो बुधैः ॥ २६१ ॥ टीका-हे महादेवि ! यह हमारी कहीहुई महाविद्या- कोही शिवविद्या कहते हैं यह विद्या सर्वप्रकार गोपनीय है इस योगशास्त्रको बुद्धिमान् लोग कदापि प्रकाश नहीं करते हैं ॥ २६१ ॥ मूलम्-हठविद्या परं गोप्या योगिना सिद्धि- मिच्छता ॥ भवेद्वीर्यवती गुप्ता निर्वीर्या च प्रकाशिता ॥ २६२ ॥ टीका-सिद्धिकांक्षी योगीलोग इस हठविद्याको अतिगोपित रक्खें यह गोप्य रखनेसे वीर्यवती रहतीहै और प्रकाश करनेसे निर्वीर्या होजातीहै ॥ २६२ ॥
पंचमपटलः । ( २०३ ) मूलम्-य इदं पठते नित्यमाद्योपान्तं विच- क्षणः ॥ योगसिद्धिर्भवेत्तस्य क्रमेणैव न संशयः ॥ स मोक्षं लभते धीमान्य इदं नित्यमर्चयेत् ॥ २६३ ॥ टीका-जो विद्वान् यह शिवसंहिताका नित्य आ द्योपान्त पाठ करेगा उसको क्रमसे अवश्य योगसिद्धि होगी और जो बुद्धिमान् इस ग्रन्थका नित्य पूजन क- रेगा उसको मुक्ति लाभ होगी ॥ २६३ ॥ मूलम्-मोक्षार्थिभ्यश्च सर्वेभ्यः साधुभ्यः श्रावयेदपि॥२६४॥क्रियायुक्तस्य सिद्धिः स्यादक्रियस्य कथम्भवेत् ॥ तस्मात्क्रिया विधानेन कर्तव्या योगिपुंगवैः ॥ २६५॥ यदच्छालाभसन्तुष्टः सन्त्यक्तान्तरसंग- कः॥ गृहस्थश्चाप्यनासक्तः स मुक्तो यो- गसाधनात् ॥ २६६ ॥ , टीका-मोक्षार्थी और सर्व साधु मनुष्य उनको यह शिवसंहिताग्रंथ सुनाना. जो क्रियासे युक्त होगा उसको सिद्धि प्राप्त होगी क्रियाहीन मनुष्यको क्या होसक्ता है अर्थात् सिद्धि लाभ.नहीं होसकती विधानपूर्वक क्रियाका अनुष्ठान करे तो इच्छापूर्वक लाभसे सन्तुष्ट होगा और
( २०४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । जो गृहस्थ होगा और इन्द्रियोंमें आसक्त न होगा सो मनु- ष्य योगसाधनसे मुक्तहोगा ॥ २६४॥ २६५ ॥ २६६ ॥ मूलम्-गृहस्थानां भवेत्सिद्धिरीश्वराणां जपेन वै ॥ योगक्रियाभियुक्तानां तस्मा- त्संयतते गृही ॥ २६७ ॥ टीका-योगक्रियावान् गृहस्थ लोगोंको जप करनेसे सिद्धि प्राप्तहोगी इस हेतुसे योगसाधनमें गृहस्थ मनु- ष्यको यत्न करना उचित है ॥ २६७ ॥ मूलम्-गेहे स्थित्वा पुत्रदारादिपूर्णः सङ्गं त्यक्त्वा चान्तरे योगमार्गे॥ सिद्धेश्चिह्नं वी- क्ष्य पश्चाद् गृहस्थः क्रीडेत्सो वै संमतं साधयित्वा ॥ २६८ ॥ टीका-जो गृहस्थ गृहमें रहके स्त्रीपुत्रादिसे पूर्ण होके अंतरीय सबसे त्यागपूर्वक योगसाधनसे प्रवृत्त होय सो सिद्धिचिह्न अवलोकनपूर्वक साधना करके सर्वदा आनन्दमें क्रीडा करेगा ॥ २६८ ॥ इति श्रीशिवसंहितायां हरगौरीसंवादे योगशास्त्रे पंचमः पटलः समाप्तः ॥ ५ ॥ शुभम् ॥ समाप्तोऽयं ग्रन्थः । पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज, श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर" छापाखाना, खेतवाड़ी-बंबई.
श्रीः। उमामहेश्वरमाहात्म्यम्। उमा भगवतीयेयं ब्रह्मविद्येति कीर्तिता। रूपयौवनसम्पन्ना वधूर्भूत्वात्र सा स्थि- ता ॥१॥ नानाजातिवधूनां हि बिंबभूताम- हेश्वरी ॥२॥ यस्याः प्रसादतः सर्वः स्वर्गं मोक्षं च गच्छति॥इह लोके सुखं तद्द्रज्जं- तुर्देवाधिकोपि वा ॥ ३ ॥ ब्रह्मा विष्णुस्त- था रुद्रः शक्राद्याःसर्वदेवताः ॥ कटाक्षपा- ततो यस्या भवंति न भवंति च॥४॥पीनो- न्नतस्तनी प्रौढजघना च कृशोदरी॥चंद्रा- नना मीननेत्रा केशभ्रमरमंडिता ॥ ५ ॥ सर्वांगसुंदरी देवी धैर्यपुंजविनाशिनी ॥ कांचीगुणेन चित्रेण वलयांगदनूपुरैः॥६॥ हारैर्मुक्तादिसंजातैः कंठाद्याभरणैरपि ॥ मुकुटेनापि चित्रेण कुंडलाद्यैः सहस्र- शः ॥ ७ ॥विराजिता ह्यनौपम्यरूपा भूष- णभूषणा ॥ जननी सर्वजगतो द्व्यष्टव- र्षा चिरंतनी ॥८॥ तया समेतं पुरुषं तत्प-
( २०६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । तिं तद्गुणाधिकम् ॥ ब्रह्मादीनां प्रभुं नाना- सर्वभूषणभूषितम् ॥ ९ ॥ द्वीपिचर्मावृतं शश्वदथवापि दिगंबरम्॥भस्मोद्धूलितस- र्वांगं ब्रह्ममूर्धौघमालिनम् ॥१०॥तथैव चं- द्रखंडेन विराजितजटातटम् ॥ गंगाधरं स्मरमुखं गोक्षीरधवलोज्ज्वलम् ॥ ११ ॥ कंदर्पकोटिसदृशं सूर्यकोटिसमप्रभम् ॥ सृष्टिस्थित्यंतकरणं सृष्टिस्थित्यंतवर्जि- तम् ॥ १२ ॥ पूर्णेन्दुवदनांभोजं सूर्यसो- माग्निवर्चसम् ॥ सर्वांगसुंदरं कंबुग्रीवं चा- तिमनोहरम् ॥ १३ ॥ आजानुबाहुं पुरुषं नागयज्ञोपवीतिनम् ॥ पद्मासनसमासी- नं नासाग्रन्यस्तलोचनम् ॥ १४ ॥ वाम- देवं महादेवं गुरूणां प्रथमं गुरुम् ॥ स्वयं- ज्योतिःस्वरूपं तमानंदात्मानमद्वयम् ॥ १५ ॥ यतो हिरण्यगर्भोयं विराजो जनकः पुमान् ॥ जातः समस्तदेवानाम्- न्येषां च नियामकः ॥१६॥ नीलकंठम- मुं देवं विश्वेशं पापनाशनम् ॥ हृदि पद्मे
उमामहेश्वरमाहात्म्यम् । (२०७)
थवा सूर्ये वह्नौ वा चंद्रमंडले ॥१७॥ कैला सादिगिरौ वापि चिंतयेद्योगमाश्रितः ॥ एवं चिंतयतस्तस्य योगिनो मानसं स्थि- रम्॥१८॥ यदा जातं तदा सर्वप्रपंचरहितं शिवम् ॥ प्रपंचकरणं देवमवाङ्मनसगो- चरम् ॥१९॥ प्रयाति स्वात्मना योगी पु- रुषं दिव्यमद्भुतम्॥ तमसः स्वात्ममोहस्य परं तेन विवर्जितम्॥२०॥ साक्षिणं सर्वबु- द्धीनां बुद्ध्यादिपरिवर्जितम् ॥ उमासहा- यो भगवान्सगुणः परिकीर्तितः॥२१॥ नि- र्गुणश्च स एवायं न यतोऽन्योस्ति कश्चन ॥ ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रः शक्रो देवसमन्वि तः ॥ २२॥ अग्निः सूर्यस्तथा चंद्रः कालः सृष्ट्यादिकारणम्॥ एकादशेंद्रियाण्यंतः करणं च चतुर्विधम्॥२३॥ प्राणाः पंचम- हाभूतपंचकेन समन्विताः ॥ दिशश्च प्र- दिशस्तद्वदुपारिष्टादधोपि च ॥२४ ॥ स्वे- दजादीनि भूतानि ब्रह्मांडं च विराड्वपुः॥
( २०८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । विराङ्हिरण्यगर्भश्च जीव ईश्वर एव च ॥२५॥ मायातत्कार्यमखिलं वर्तते स- दसच्च यत् ॥ यच्च भूतं यच्च भव्यं तत्सर्वं स महेश्वरः ॥ २६ ॥ इति श्रीमदुमामहेश्वरमाहात्म्यं संपूर्णम् । पुस्तक मिलनेका ठिकाना. खेमराज श्रीकृष्णदास, श्रीवेङ्कटेश्वर छापाखाना ( मुंबई. )
क्रयपुस्तकें-( योगशास्त्रग्रंथाः । ) नाम. की. रु. आ. पातंजलयोगदर्शन-अत्युत्तम भाषानुवाद सहित १-० सांख्यदर्शन अत्युत्तम भाषानुवाद सहित ... १-८ वैशेषिकदर्शन सुबोध भाषानुवाद समेत ... ०-१२ हठयोगप्रदीपिका उत्तम भाषाटीका सहित ... १-४ शिवस्वरोदय भाषाटीका ... ... ... ०-८ शिवसंहिता भाषाटीका सह ( योगशास्त्र ) ... १-० गोरखपद्धति भाषाटीका ( योगसाधनविधि ) ०-१२ स्वरोदयसार चरणदासकृत ... ... ... ०-२ योगतत्त्वप्रकाशभाषा ( योगाभ्यासकी प्रणाली परमोपयोगी है ) ... ... ... ०-२ स्वरदर्पण सटीक १ स्वर प्रश्नवर्णित हैं ... ०-४ वेदान्तग्रन्थाः । ब्रह्मसूत्र ( शारीरक ) वेदान्ततत्त्वप्रकाश भाषा- भाष्य समेत श्रीप्रभुदयालुविरचित बहुत सरल सुबोध है ... ... ... ४-० ब्रह्मसूत्र ( शारीरक ) भाषाटीका .... ... १-८ वेदान्तपरिभाषा शिखामणि टीका और मणि- प्रभा टीकासमेत ... .... .... २-८ वेदान्तपरिभाषा अर्थदीपिका टीकासमेत ... १-० वेदान्तपरिभाषा अत्युत्तम भाषाटीका समेत ... १-४ वेदान्तसार संस्कृत मूल और संस्कृतटीका तथा भाषाटीकासहित ,. ... ... ०-१२ पंचदशीसटीक ( संस्कृत टीका ) ... .... २-०
२ जाहिरात. पंचदशी पं० मिहिरचंद्रकृत अत्युत्तम भाषाटीका सहित ... ... ... ४-० पंचदशी भाषा-आत्मस्वरूपजीकृत ... ... ३-० शारीरक ब्रह्मसूत्रम्-मध्वभाष्यसमेतं तत्त्वप्रका- शिका टीकोपेतं च ... ... ... ५-० गीता चिद्घनानंदस्वामिकृत गूढार्थदीपिका मूल अन्वय पदच्छेदके सहित भाषाटीका ... ७-० गीता आनंदगिरिकृतभाषाटीका ... ... २-८ श्रीमद्भगवद्गीता सान्वय ब्रजभाषा दोहा सहित १-४ गीतामृततरंगिणी भाषाटीका ( रघुनाथप्रसा- दकृत ) अक्षरबड़ा ... ... १-० गीतामृततरंगिणी भाषाटीका पाकिटबुक ... ०-१२ श्रीरामगीता मूल... ... ... ०-२ श्रीरामगीता भाषाटीका पदप्रकाशिका अनुवा- दसमुच्चय और विषमपदिके सहित ... ०-८ श्रीमद्भगवद्गीतापंचरत्न अक्षर मोटा गुटका रेशमी ... ... ... १-० " पंचरत्न अक्षरबड़ा खुलापत्रा छोटीसंची ... १-८ " पंचरत्न अक्षरबड़ा लंबीसंची खुला ... १-० " पंचरत्न भाषाटीका .... ... २-० गीता श्रीधरीटीका सहित... ... १-० गीता बड़े अक्षरकी १६ पेजी गुटका ... ०-१२ गीता बड़े अक्षरकी खुली १२ पेजी ... ... ०-१० गीता गुटका विष्णुसहस्रनाम सहित ... ०-८ गीता पंचरत्न और एकादशरत्न ... .... ०-१२ " पंचरत्न द्वादशरत्न .... ... ० १०
जाहिरात. ३ गीतापंचरत्न नवरत्न पाकिटबुक ... ... ०-७ गीता गुटका पाकिट बुक् .... ... ... ०-५ अष्टावक्रगीता अत्युत्तम सान्वय भाषाटीका... १-० शिवगाता भाषाटीकासहित ... ... ०-१२ गणेशगीता भाषाटीकासहित ... ... ०-६ गीतापंचदश भाषाटीका [ काश्यपगीता, शान- कगीता, अष्टावक्रगीता, नहुषगीता, सरस्व- तीगीता, युधिष्ठिरगीता, बकगीता, धर्मव्या- धगीता, श्रीकृष्णगीतादि ] ... ... ०-१२ पाण्डवगीता भाषाटीका सह ... ... ०-३ तथा मूल ४ रत्न बड़ा अक्षर ... ... ०-२ देवीगीता भाषाटीका ... ... ... ०-८ अपरोक्षानुभूति संस्कृतटीका भाषाटीका सहित ०-१० आत्मबोध भाषाटीका ... ... ... ०-३ तत्त्वबोध भाषाटीका ... ... ... ०-२ वेदांतग्रंथपंचकम्( वाक्यप्रदीपः, वाक्यसुधारसः, हस्तामलकः, निर्वाणपंचकं, मनीषापंचकं स० ०-८ वेदस्तुति भाषाटीका सह ... ... ... ०-८ गीता रामानुजभाष्य ... ... २-० भगवद्गीता भावप्रकाशटीकायाः ... ... ३-० वैराग्यभास्कर भाषाटीका ... ... ०-८ सिद्धांतचंद्रिका सटीक ( वेदांत ) ... ... ०-८ द्वादशमहावाक्यविवरण ... ... ... ०-४ वेदांतरामायण भाषाटीका सह ; ... ... १-८ वेदान्तसंज्ञा भाषाटीका ... ... ०-८ प्रश्नोत्तरमुक्तावली भाषाटीका ( वेदान्त ) ... ०-३
४ जाहिरात. जीवन्मुक्तगीता भाषाटीका ... ... ०-१ भक्तिमीमांसा-शांडिल्यऋषिप्रणीता आचार्य स्वप्नेश्वरविरचितेन भाष्येण संयुता ... ०-८ योगवासिष्ठ सटीक संस्कृत ... ...२०-० कपिलगीता भाषाटीका ... ... ... ०-६ अवधूतगीता गुटका रेशमी... ... ... ०-५ नारदगीता मूल .... .... ... ०-१ प्रश्नोत्तरी भाषाटीका ... ... ... ०-२ वेदान्त भाषा । आत्मपुराण भाषा [ चिद्धनानन्द स्वामिकृत ] १२-० योगवासिष्ठभाषा बड़ा संपूर्ण ... ...१२-० योगवासिष्ठगुटका वैराग्य मुमुक्षु प्रकरण वेदान्त उत्तम कागज अक्षर बड़ा... .... ... ०-१२ वासिष्ठसार भाषा वेदान्त ६ प्रकरण... ... २-० मोक्षगीता ( सवालक्ष ) रामनाम ... ... १-० वृत्तिप्रभाकर स्वामी निश्चलदासकृत ( वेदान्तका ग्रंथ शुद्धकर नया छपा है ) .... ... ३-० विचारसागर सटीक निश्चलदासजीकृत ... २-० एकादशस्कंध भाषा चतुरदासकृत .... ... ०-१२ अमृतधारा वेदान्त .... .... ... ०-१२ संतोषसुरतरु वेदांत ; ... ... ... ०-८ संतप्रभाव वेदांत ... .... .... ०-६ विचारमाला सटीक श्रीगोविन्ददासजीकी टीकास. ०-१२ अभिलाषसागर भाषा ( वेदांत ) ... .... १-८ संपूर्ण पुस्तकोंका "बड़ासूचीपत्र" अलगहै मँगालीजिये । खेमराज श्रीकृष्णदास “श्रीवेङ्कटेश्वर” स्टीम् प्रेस-बंबई.