भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पृष्ठ 205

पंचमपटलः । ( २०१ ) मिको त्यागके दिव्य देह होके आकाशमार्गसे संसारमें इच्छापूर्वक भ्रमण करेगा और पृथ्वीके छिद्रोंको देखे- गा अर्थात् पृथ्वीमें प्रवेश करनेके मार्ग देखेगा ॥२५५॥ मूलम्-अष्टाविंशतिभिर्लक्षैर्विद्याधरपतिर्भ- वेत् ॥ साधकस्तु भवेद्धीमान्कामरूपो म- हाबलः ॥ २५६ ॥ त्रिंशल्लक्षैस्तथाऽजस्रैर्ब्र- ह्मविष्णुसमो भवेत् ॥ रुद्रत्वं षष्टिभिर्लक्षै- रमरत्वमशीतिभिः ॥ २५७॥ कोट्यैकया महायोगी लीयते परमे पदे ॥ साधकस्तु भवत्यागी त्रैलोक्ये सोऽतिदुर्लभः॥२५८॥ टीका-जो बुद्धिमान् साधक अट्ठाईस लक्ष जप करे- गा वह महाबल कामरूपी और विद्याधरपति होजायगा और तीस लक्ष जप करनेसे साधक ब्रह्मा विष्णुके समान होजायगा और साठ लक्ष जप करनेसे रुद्रके समान हो- जायगा और अस्सी लक्ष जप करनेसे साधक सर्व भूतोंको प्रिय देव होजायगा और एककोटि जप करनेसे साधक महायोगी होयके परमपदमें लीन होजाताहै हे पार्वति ! इसप्रकार योगी त्रिभुवनमें दुर्लभहै॥२५६।२५७।२५८॥ मूलम्-त्रिपुरे त्रिपुरन्त्वेकं शिवं परमकार- णम् ॥ २५९ ॥ अक्षय्यं तत्पदं शान्तमप्र-