भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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( ५८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-गुरुको सब तरहसे प्रसन्न करके जो विद्या मिलतीहै उस विद्याका फल शीघ्र होताहै अर्थात् थोडे कालमें सिद्ध होजातीहै ॥ १२ ॥ मूलम्--गुरुः पितागुरुर्माता गुरुर्देवो नसंश- यः ॥ कर्मणा मनसा वाचा तस्मात्सर्वैः प्रसेव्यते ॥१३॥ गुरुप्रसादतः सर्वं लभ्य- ते शुभमात्मनः ॥ तस्मात्सेव्यो गुरुर्नि- त्यमन्यथा न शुभं भवेत् ॥ १४॥ प्रदक्षि- णत्रयं कृत्वा स्पृष्ट्वा सव्येन पाणिना ॥ अष्टांगेननमस्कुर्याद्गुरुपादसरोरुहम् ॥१५॥ टीका-गुरु पिता और गुरु माता और गुरु देवता है इसमें संशय नहीं है इस हेतुसे गुरुको कर्मसे मनसे वाक्यसे सब प्रकारसे सेवा करना उचितहै गुरुके प्र- सादसे आत्माका सब शुभ होजाता है इसलिये गुरु- की नित्य सेवा करना उचित है दूसरी तरह शुभ नहीं है गुरुको तीन प्रदक्षिणा करके दक्षिण हाथसे स्पर्श करके गुरुके चरणकमलमें साष्टांग नमस्कार करना उचित है ॥ १३ ॥ १४ ॥ १५ ॥ मूलम्-श्रद्धयात्मवतां पुंसां सिद्धिर्भवति नान्यथा ॥ अन्यथाश्च न सिद्धिः स्यात्त- स्माद्यत्नेन साधयेत् ॥ १६ ॥