भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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तृतीयपटलः । ( ५७ ) परमगतिको प्राप्त होताहै अर्थात् मोक्ष होताहै ॥ ९ ॥ मूलम्--अधुना कथयिष्यामि क्षिप्रं योगस्य सिद्धये ॥ यज्ज्ञात्वा नावसीदन्ति योगि- नो योगसाधने ॥ १० ॥ टीका-अब जो हम कहते हैं इस विधिसे बहुत शीघ्र योग सिद्ध होता है और इसके जान लेनेसे योगीको योगसाधनमें कष्ट नहीं होता ॥ १० ॥ मूलम्-भवेद्वीर्यवती विद्या गुरुवक्त्रसमुद्भ- वा॥ अन्यथा फलहीना स्यान्निर्व्वीर्याप्य- तिदुःखदा ॥ ११ ॥ टीका-जो विद्या गुरुके मुखसे सुनी वा जानी जाती है वह वीर्यवती होतीहै और अन्य प्रकारसे विद्या फलहीन निर्वीर्या और अतिदुःखकी देनेवाली होती है. तात्पर्य यह है कि, योगविद्या वा अन्यविद्या भलेप्रकार गुरुसे जानकरके करना उचित है जो लोक पुस्तकसे वा किसीको करते देखते योगादिक क्रिया आरम्भ करदे- ते हैं उनका कल्याण नहीं होता यथार्थ न जाननेसे कष्टही होताहै ॥ ११ ॥ मूलम्-गुरुं सन्तोष्य यत्नेन ये वै विद्यामु- पासते ॥ अवलम्बेन विद्यायास्तस्याः फलमवाप्नुयुः ॥ १२ ॥