भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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( ५६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-वह दश वायुमें पांच मुख्य हैं फिर उनमेंभी निश्चय करके श्रेष्ठ करता श्रीमहादेवजी कहते हैं कि, हमने प्राण और अपानको कहाहै ॥ ६ ॥ मूलम्-हृदि प्राणोगुदेऽपानः समानोनाभि- मण्डले ॥ उदानः कण्ठदेशस्थो व्यानः सर्वशरीरगः ॥ ७ ॥ नागादिवायवः पञ्च कुर्वन्ति ते च विग्रहे ॥ उद्गारोन्मीलनंक्षु- त्तृड्जृम्भा हिक्का च पञ्चमः ॥ ८ ॥ टीका-हृदयस्थानमें प्राणकी स्थिति है और गु- दामें अपान और नाभिमण्डलमें समान और कण्ठ- में उदान और व्यान सब शरीरमें व्याप्तहै और नाग आदि जो पांच वायु हैं वह शरीरमें डकार, हिचकी, जँभाई, क्षुधा, पिपासा, उन्मीलन अर्थात् निद्रासे जाग्रत् होनेके समय जो नेत्रके खुलनेका हेतु है यह सब कार्य करते हैं ॥ ७ ॥ ८ ॥ मूलम्-अनेन विधिना यो वै ब्रह्माण्डं वेत्ति विग्रहम् ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम् ॥ ९ ॥ टीका-इस विधानसे जो पहिले कहा है शरीरको जो मनुष्य ब्रह्माण्ड जानता है वह.सर्व पापोंसे मुक्त होके