भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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तृतीयपटलः । (६७) मूलम्-ततोऽभ्यासे स्थिरीभूते न तादृङ्निय- मग्रहः ॥ ४५ ॥ अभ्यासिना विभोक्तव्यं स्तोकं स्तोकमनेकधा ॥ पूर्वोक्तकाले कुर्यात्तु कुम्भकान्प्रतिवासरे ॥ ४६ ॥ टीका-जब अभ्यास स्थिर होजाय तब पूर्वोक्त निय- मका कुछ प्रयोजन नहीं है ॥ ४५ ॥ और अभ्यासीको उचित है कि, थोडा थोडा कईबार भोजनकरे और जिस- प्रकार पहिले कहा है उसीतरह नित्य कुम्भक करे॥४६॥ मूलम्-ततो यथेष्टा शक्तिः स्याद्योगिनो वा- युधारणे ॥ यथेष्टं धारणाद्वायोः कुम्भकः सिद्ध्यति ध्रुवम् ॥ केवले कुम्भके सि- द्धे किं न स्यादिह योगिनः ॥ ४७ ॥ टीका-योगीको वायु धारण करनेकी शक्तिं इच्छा- के अनुसार होजायगी. जब इच्छानुसार धारणशक्ति होजायगी तब कुंभक निश्चय सिद्ध होगा और केवल कुम्भक सिद्ध होनेसे योगी क्या नहीं करसकता अर्थात् सब सिद्ध करसकता है ॥ ४७ ॥ मूलम्-स्वेदःसंजायते देहे योगिनः प्रथमो- द्यमे ॥ ४८ ॥ यदा संजायते स्वेदो मर्दनं