शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । कारयेत्सुधीः ॥ अन्यथा विग्रहे धातुर्न- ष्टो भवति योगिनः ॥ ४९ ॥ टीका-योगीके शरीरमें प्रथम स्वेद अर्थात् पसीना उत्पन्न होता है जब स्वेद उत्पन्न होय तो उसको शरी- रमें मर्दन करे अन्यथा अर्थात् मर्दन न करनेसे योगी- के शरीरका धातु नष्ट होजाता है ॥ ४८ ॥ ४९ ॥ मूलम्-द्वितीये हि भवेत्कम्पो दार्दुरी मध्यमे मतः ॥ ततोऽधिकतराभ्यासा द्गगनेचरसाधकः ॥ ५० ॥ टीका-दूसरे भूमिकामें कंप होताहै तीसरेमें दार्दु- रीवृत्ति होती है अर्थात् आसन उठता है फिर भूमिपर आयजाता है उससे अधिक अभ्यास होनेसे योगी गगनमें स्वेच्छाचारी होजाताहै ॥ ५० ॥ मूलम्-योगी पद्मासनस्थोऽपि भुवमुत्सृज्य वर्तते॥ वायुसिद्धिस्तदा ज्ञेया संसारध्वा- न्तनाशिनी ॥ ५१ ॥ टीका-योगी पद्मासनस्थ होके पृथिवीको त्यागके आकाशमें स्थिर रहे तब जाने कि, संसारके अन्धकार नाश करनेवाली वायु सिद्ध होगई ॥ ५१ ॥ मूलम्-तावत्कालं प्रकुर्वीत योगोक्तनियम-