भारतकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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( ८६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमता । का ज्ञान होताहै इस हेतुसे यह सिद्धासन पवनाभ्या- सीको सदा सेवनेके योग्यहै ॥ १०४ ॥ मूलम्-येन संसारमुत्सृज्य लभते परमां गतिम् ॥१०५॥ नातः परतरं गुह्यमासनं विद्यते भुवि ॥ येनानुध्यानमात्रेण योगी पापाद्विमुच्यते ॥ १०६ ॥ टीका-इस सिद्धासनके प्रभावसे साधक संसारको छोडके परमगतिको पाताहै और इससे उत्तम वा गोप्य संसारमें दूसरा आसन नहीं है जिसके ध्यानमात्रसे यो- गी सर्व पापसे मुक्त होजाताहै ॥ १०५॥१०६॥ मूलम्-उत्तानौ चरणौ कृत्वा ऊरुसंस्थौ प्रयत्नतः ॥ ऊरुमध्ये तथोत्तानौ पाणी कृत्वा तु तादृशौ ॥ १०७ ॥ नासाग्रे वि- न्यसेद्दृष्टिं दन्तमूलञ्च जिह्वया ॥ उत्तोल्य चिबुकं वक्ष उत्थाप्य पवनं शनैः ॥१०८॥ यथाशक्त्या समाकृष्य पूरयेदुदरं शनैः॥ यथा शक्त्यैव पश्चात्तु रेचयेदविरोधतः ॥ १०९ ॥ इदं पद्मासनं प्रोक्तं सर्वव्याधि- विनाशनम् ॥ दुर्लभं येन केनापि धीमता लभ्यते परम् ॥ ११० ॥